साहित्य

दिशा दिशा कुछ बोले

किरण झा

सूरज ने ली अंगड़ाई
चलने लगी है पुरवाई
मस्त पवन है डोले
दिशा दिशा कुछ बोले

कुहुक उठी है काली कोयलिया
भंवर घूमता देखो बगिया
कली कली को चुमे
दिशा दिशा कुछ बोले

कैसा ये मदमस्त शमां है
लगे जैसे स्वर्ग यहां है
अद्भुत हैं नजारें
दिशा दिशा कुछ बोले

कहीं अजान तो सतनाम
मंदिर में हो रहा प्रभुनाम
चर्च में घंटा बाजे
दिशा दिशा कुछ बोले

“किरण” ने पलकें खोली श्री
प्रकृति बना रही रंगोली
हिय खाते हिचकोले
दिशा दिशा कुछ बोले

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