साहित्य

दीया तले अँधेरा

नंदिनी लहेजा

क्यों करता तू बन्दे, बेटे-बिटिया में फर्क इतना
दोनों ही तो तेरा हिस्सा,
फिर क्यों समझे बिटिया पराई और बेटा अपना
बेटे को मानते हो कुलदीपक,
तो बिटिया भी तो घर की रोशनी है
पर तेरी पुरानी सोच के कारण,
दिया तले अँधेरे की बात तो होनी है
वो जो तेरी गुड़िया रानी है,
महकती घर आँगन को
इक दिन बिदा जब हो जाती तब,
अहसास तुझे फिर होता है
दिए की तरह जलती स्वयं है,
प्रकाश दो कुलों को देती
पर स्वयं के जीवन में वह केवल,
तुम सब का स्नेह चाहती
दिया तले अँधेरे जैसा रहता है उसका जीवन
सम्मान,प्रेम की आस में बस अपनी लौ का न बुझने देती

नंदिनी लहेजा
रायपुर(छत्तीसगढ़)
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित

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