साहित्य

डॉ अनुज कुमार चौहान “अनुज” की कलम से

संसार दे दो माँ

बेटी हूँ आपकी मैं,
उपहार दे दो माँ ।
मुझे गर्भ में ना मारो,
संसार दे दो माँ ।।
सम्मान बनूँगी माँ,
तेरा अभिमान भी ।
सौभाग्य बनूँगी माँ,
तेरा अरमान भी ।।
कुदरत का पुष्प हूँ,
अधिकार दे दो माँ ।
मुझे गर्भ में ना मारो,
संसार दे दो माँ ।।
मेहनत लगन के बल पर,
राह आसां करूँ ।
दामन को थाम तेरा,
रोशन जहां करूँ ।।
आँगन में खिल-खिलाऊँ,
कुछ प्यार दे दो माँ ।
मुझे गर्भ में ना मारो,
संसार दे दो माँ ।।
जननी हो समझ हो,
ना करूँ अवमानना ।
हर बात तेरी मानूँ,
मेरी सुन लो प्रार्थना।।
सौगात बन के गाऊँ,
“अनुज”दीदार दे दो माँ।
मुझे गर्भ में ना मारो,
संसार दे दो माँ ।।

मेरा गणतंत्र हो !!

मन प्रेम समर्पण हो ,
सद्भाव मंत्र हो ।
विश्वास लोक पर भी,
विश्वास तन्त्र हो ।।
आशंका रहित होके,
करें बाधा का सामना ।
सीमा सशक्त हों ,
सरंक्षित हो भावना ।।
जीवन सरल बना लूँ,
मेरा गणतंत्र हो ।
मन प्रेम समर्पण हो,
सद्भाव मंत्र हो ।।
हो पंथ चाहे कोई,
इंसानियत रहे ।
सत्कर्म न्याय कारक,
काबिलियत रहे ।।
बेवश ना आशियां हो,
साधक स्वतंत्र हो ।
मन प्रेम समर्पण हो,
सद्भाव मंत्र हो ।।
आजादी जिनके कारण,
पल-पल वो याद आएँ ।
रहे शान तिरंगे की ,
संविधान के शब्द भाएँ ।।
आदर्श ‘अनुज’ सक्षम,
प्रेरक संयंत्र हो ।
मन प्रेम समर्पण हो ,
सद्भाव मंत्र हो ।।
डॉ अनुज कुमार चौहान “अनुज”
अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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