साहित्य

डॉ.गोरथनसिंह सोढा ‘जहरीला’ की कलम से

मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद किसानों को स्वराज की जरूरत मानते थे।
वे मजदूर किसानों को भारत की सूरत मानते थे।।

इक तरफ देश गुलाम दूसरी सामंतशाही भी सताती थी।
धरती पुत्रों में इनसे छुटकारा होने का
मुहर्त मानते थे।।

वे किसानों के दुःख सुख में हिस्सेदार बन गए।
किसान उनकी चेतना का अमिट हिस्सा बनना जरूरत मानते थे।।

उन्होंने किसानहित वरदान, सेवासदन, रंगभूमि, प्रेमाश्रम, कर्मभूमि उपन्यास लिखे ।
अपनी कहानियों में भारतीय गाँवों का चित्रण की जरूरत मानते थे।।

‘जहरीला’ मुंशीजी गौरी सरकार के लिए सिर दर्द बने।।
देश का हर वर्ग बंधनों से छूटे आजादी की जरूरत मानते थे।।

सखा

सखा कृष्ण सुदामा का बना।
सीना इक गरीब का तना।।

दोस्ती करनी तो उनके जैसी।
वरना रिश्ता मतलब का बना।।

यारी आजकल की तो देखिए।
पल में दुश्मन दोस्त का बना।।

दोस्त का दोस्त रिश्ता जोड़के।
एकबारगी गर वह अपना बना।।

जीना दुश्वार कर देता हमारा।
जैसे दोस्त नहीं दुश्मन बना।।

‘जहरीला’ गरीब का कोई नहीं।
ऐरागेरा दोस्त पैसेवाले का बना

उपकार

जब तक शरीर में साँस है उपकार किए जा।
तू इंसान है हर जीव से प्यार किए जा।।

किसी अबोले को चोट न पँहुचे ऐसा जीवन जी।
कोई मिले चोट ग्रस्त तो उसका उपचार किए जा।।

न्यात पवित्र गंगा है इसमें अपवित्रता नहीं होनी चाहिए।
समाज में फैली कुरीतियों का तू सुधार किए जा।।

मांस दारू में लिप्त रहना पाप कर्म होता है।
जीवन में बस धर्म कर्म का खुमार किए जा।।

‘जहरीला’ पतन के गर्त में जो जा रहे हैं।
उन्हें बाहर निकालने का भरपूर जुगार किए जा।।

गुरू वन्दना

गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।
मात पिता आप हम तेरे नन्दन ।।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।

आप भगवन अवगुण हर लो हमारे ।
आक बबूल से हमें करलें चन्दन ।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।
मात पिता आप हम तेरे नन्दन ।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।।

परमेश्वर के बराबर आपको हम माने ।
सब जग जाने रघु के नन्दन ।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।
मात पिता आप हम तेरे नन्दन ।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।।

गुरू ही वेतरनी से हमको तिराये ।
मोक्ष दिलाये छुड़ाये भव के बन्धन ।।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।
मात पिता आप हम तेरे नन्दन ।।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।

हमारे सिर पर हाथ धरो आप ।
‘जहरीला’ आओ पधारो हम करते अभिनन्दन ।।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।मात पिता आप हम तेरे नन्दन ।।
गुरू चरणों में हम करते वन्दन ।

सावन

झूम झूम कर चंहूओर धरती पर सावन सरसाया।
नाचो गाओ धूम मचाओ बहारों का मौसम आया।।

ठण्डी ठण्डी पुरवाई चलने लगी दिल मचलने लगी।
कलियों पर मँडरा कर भँवरों ने गीत गाया।।

मयूरा नाचे कोयल गाये उमड़ घुमड़कर बादल आये।
दशों दिशाओं में रिमझिम रिमझिम पानी खूब बरसाया।।

‘जहरीला’ हर सख्स खुशी से उछलने लगा है।
हर जगह हर ठौर सावन ने रंग जमाया।।

डॉ.गोरथनसिंह सोढा ‘जहरीला’
जिलाध्यक्ष
अखिल भारतीय साहित्य परिषद
बाड़मेर राजस्थान

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