साहित्य

डॉ पंकजवासिनी की कलम से

पावस में अभिसार

कारे कजरारे नयनों में…
लिए पिया मिलन की चाह!!
भार यौवन से लदी गोरी!
भर रही है ऊष्म आह!!

मंद मदिर मधुर मादक चाल!
अभिसार की राह सजनी!!
झिझक झिझक पग धरे मग प्रिया!
आमंत्रण देती रजनी!!

पड़ गई रे साजन की दीठ!
लाज भर भर सकुचाई रि!!
बंकिम नैना भये लाज नत!
मुदित अधर थरथराये रि!!

सजन उतावला धीर खोकर
पकड़े बाहें कर कठोर!
निठुराई न भाय सजनी को
रूठ, करे मुख एक ओर!!

कान्हा तेरे प्रेम में

तुम्हारे पावन प्रेम के प्रकाश में!
नहाई मैं हुई निर्मल कान्हा रे!!

धुल गया सारा तम तहाया!
मेरे तन मन औ आत्मा का!!

प्रभु भर दे प्रकाश अंतस् में!
जगमग जगमग मन-दीप जले!!

तेरी पावन परम ज्योति में!
मेरी आत्मा की ज्योति मिले!!

मन की सब कलुषता धुल गई!
सांसारिकता सारी घुल गई!!

भावों के सहस्त्रदल खिल उठे!
जागा दिव्य प्रेम जग मोह मिटे!!

मैं भारत हूंँ

मैं भारत हूंँ :आध्यात्मिकता में सिरमौर!
कही गीता की वाणी! सुना संसार कर गौर!!

प्रथम सभ्यता प्रथम लोकतंत्र का सूत्रधार!
विश्व में मैं ही! दिव्य वेदों का रचनाकार!!

वसुधैव कुटुंबकम् का मैं ध्वजवाहक!
विश्व शांति का पुरोधा! आत्मा से साधक!!

अनेकता में एकता का अप्रतिम उदाहरण!
विश्व संस्कृति की समृद्धि का मैं कारण!!

विश्व बंधुत्व भावना का मैं ही प्रथम हामी!
मानवता-प्रहरी! संवेदनाओं का स्वामी!!

मैं ऋषि-मुनियों की धरा मनीषा का आगार!
जहाँ श्री- शक्ति – सरस्वती: भक्ति का आधार!!

देवता भी लालायित : पाएँ मानव जन्म यहांँ!
अनुसूइया – सीता – राधा – सी देवियांँ कहांँ!?!

मर्यादा पुरुषोत्तम राम, कृष्ण योगेश्वर!
मैं ही! जीवन कौशल सिखाता आदि से भू पर!!

परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम!
उच्चादर्श अ मानवीय मूल्य हैं मम धनम्!!

ज्ञान विज्ञान और तकनीक का मैं आदि धनी!
पाश्चात्य मूल्यों से सदा हमारी ठनी!!

विश्व पर्यावरण संरक्षण या मानव हित – योग!
मैं ही ध्वजवाहक! कहता: जग अति न कर भोग!!

सत्य अहिंसा का पुजारी, नीतियों का प्रेमी!
तीर्थ व्रत उपवास, स्नान – ध्यान का नेमी!!

तरु – नग – रवि देव, धरा- गंगा – तुलसी माता
कृतज्ञ सदा प्रकृति का मैं! मानूँ संकट त्राता!!

आत्मबल का धनी, संघर्षों में अपराजेय!
देता संदेश: जग में नहीं कुछ अपौरुषेय!!

मेरे वीर डटे मेरी रक्षा में सीमा पर!
करते सदा प्राण – उत्सर्ग मेरी गरिमा पर!!

इन पुण्यात्माओं के ही कारण मैं अखंड!
अंतर्विरोध झेलता भी मैं दिव्य मार्तंड!!

रहा विश्व गुरु मैं :फहरेगी मम कीर्ति विमल!
सौगंध मुझे निज संस्कृति की: जग वंदित धवल!!

डॉ पंकजवासिनी
असिस्टेंट प्रोफेसर
भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!