साहित्य

डॉ पंकजवासिनी की कलम से

बेटी

1.
तू
बेटी
प्यारी है
किलकारी
गूँजे घर में
खुश होवें सब
सुन के वाणी न्यारी!

2.
ये
बेटी
कितनी
भोली भाली
मंगलकारी
शुभ पावन सी
तुलसी आँगन की!

3.
तू
सोन
चिरैया
चुलबुल
मनभावन
फुदक फुदक
चले मेरे आँगन!

4.
वो
मेरे
आँगन
की चहक
उसके बोल
लगते कानों में
कोयल की कुहुक!

5.
जो
माँ के
हृदय
की पीड़ा को
समझे खूब
अंतरंग सखी
बन दे सदा साथ!

6.
ये
पिता
के हिया
की कोमल
अभिव्यक्ति हैं
और पितु शीश
का गरिमा- मुकुट!

देश हमारा

है
देश
हमारा
बड़ा प्यारा
जग से न्यारा
संस्कृति समृद्ध
शीश नत संसारा!

है
मेरा
भारत
ऋषि मुनि
से संवर्धित
और आध्यात्मिक
गरिमा से गर्वित!

ये
देश
भारत
है बड़ा ही
अतिथि प्रिय
अपनाए जग
महा शरणस्थली!

है
धरा
अपनी
अलबेली
महिमामयी
जग त्राण करे
बनके शांतिदूत!

है
धरा
महान
दधीचि की
देती है सीख
सर्वस्व उत्सर्ग
मानव कल्याण में!

है
देश
राणा का
अभिमानी
घास की रोटी
खायी देश हित
राज सुख तज के!

है
धन्य
धरा ये
भारत की
इसके शूर
अरि को त्वरित
करते भू लुंठित

है
गर्व
कि हम
जन्मे यहाँ
जहाँ आने को
लालायित सदा
स्वर्ग से भगवान!

डॉ पंकजवासिनी
असिस्टेंट प्रोफेसर
भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय

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