साहित्य

डॉ.विनय कुमार श्रीवास्त की कलम से

लयुग में हर घर शहर में रावण


रावण त्रेता युग का है एक विद्वान पंडित था।
उसका कुकर्म मात्र वह सीताहरण किया था।

अपनी मर्यादा का सदा ध्यान रखा रावण ने।
कोई जोर जुल्म सीता से ना कभी किया था।

निजी महल में वह सीता को कभी नहीं रखा।
अशोक वाटिका में ही वह माँ सीता को रखा।

जोर जबरदस्ती भी कोई उसने कभी न किया।
सीता माँ के रक्षा में उसने त्रिजटा को था रखा।

आज तो हर घर में दुर्योधन रावण हैं विद्यमान।
चरित्र की बात छोड़ें माँ-बाप का भी नहीं मान।

रोज ही चीर हरण करते करते सीता हरण भी।
ना समाज का डर कोई ना अपनी कोई मर्यादा।

बेटियों की लाज बचे कैसे रास्ता चलना दूभर है।
किडनैपिंग बलात्कार रोज जोरजबरदस्ती होती।

संस्कार की कमी है ये मूल्यों आदर्शों की कमी है।
इज्जत लूट रहे नारी की हत्या करने पर आमादा।

कलयुगी ये रावण हैं मंदोदरी नहीं समझा सकती।
माँ-बाप बेचारे लाचार स्वयं इन्हें ना समझा सकते।

सजा देर से मिलती इनको यह कानून खराबी है।
इनकी करनी का फल जब मिलता है तो रोते यह।

फाँसी से हमें बचायें हम ऐसा नहीं करेंगे जीवन मे।
कुत्ते की पूंछ ना सीधी होती सीधी है तो पागल है।

रावण तो मरता जलताहै केवल दसमी दशहरा में।
कलयुगी रावणों को फाँसी दें केवल यही सजा है।

काम निकल जाये तो पहचानने से कतराता है

शहर बदलते ही बदल जाता है,
इसी चाय का जायका अक़्सर।

इंसानों कीतो क्याबात करनी है,
उनको पल पल बदलते देखा है।

जब तलक काम हो कोई उनका,
आपमें ही भगवान नज़र आते हैं।

थोड़ा इंतज़ार करो काम हो जाये,
बदला-2 ये इंसान नज़र आ जाये।

यह भी देखा है कभी-2 या अक्सर,
इंसान पहचानने से भी कतराता है।

यही तो है दुनिया का दस्तूर पुराना,
वक्त वेवक्त जमाना बदल जाता है।

ज़माने से कोई नहीं शिक़ायत मेरी,
यहाँ हर एक इंसान बदल जाता है।

कौन पूछता है ये भला कभी उसको,
पत्थर गढ़ जो भगवान बना देता है।

पत्थर पूजो गे सभी मंदिर में जाकर,
पड़ोसी भूखा है पूछें न कभी जाकर।

यही तो हाल है इस बेदर्द ज़माने का,
समय-2 पे हर इंसान बदल जाता है।

जिन्दा मछली धारा के विपरीत है चलती


मरी हुई ये मछली ही तो केवल।
जल धारा के साथ सदा बहती है।।

जिन्दा मछली ही ये जीवन भर।
धारा के विपरीत ही सदा बहती है।।

अन्याय कभी नहीं देखा जाता।
करना चाहिए इसका विरोध सदा।।

न्याय के साथ ही रहना केवल।
अन्याय हेतु बनें आप अवरोध सदा।।

स्वामी विवेकानंद ने सदा कहा।
सत्य मार्ग पर सदैव चलना सीखें।।

ईमान धर्म के संग ही ये जीवन।
जब तक जीवित रहें जीना सीखें।।

झुकना नहीं झुकाने की हिम्मत।
खुद में यह ताकत तो लाना होगा।।

कर्म व व्यक्तित्व ऊँचा रहे हमेशा।
ऐसा कृत्य विचार हमें बनाना होगा।।

जीता वही यहाँ शान से है हरदम।
जिसमे ढ़ंग से जीने का है दम होता।।

विदेशियों के पीछे भागें न हरदम।
अपने संस्कृति सभ्यता में दम होता।।

ये संसार तो एक रंगमंच है यारों।
अपना-2 पाट यहाँ करना ही होगा।।

विश्व गुरु बनने की शक्ति है हममें।
धर्म कर्म उच्च चरित्र से रहना होगा।।

डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
(शिक्षक,कवि,लेखक,समीक्षक एवं समाजसेवी)
इंटरनेशनल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर-नार्थ इंडिया
एलायन्स क्लब्स इंटरनेशनल,कोलकाता, इंडिया
संपर्क : 9415350596

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