साहित्य

दर्प घमण्ड

रेखा रानी

जिस दिन प्राणी तेरे उर में,
भूल से भी दर्प जो आया।
तभी जाएगा तू माटी में,
रोक न तुझको कोई पाया।
दर्प विनाशक बल शौर्य का,
सब सपनों का महल ढहाया।
दर्प न कीजै धन काया का,
यह है चलती फिरती छाया।
खोला जब इतिहास झरोखा,
दर्प ने मर्दन किया अनोखा।
बीस भुजा दस शीश रावना,
शंकर जी का प्रिय था घना।
शंकर भक्त वत्सल महादानी ,
भस्मासुर कृपा अति मानी।
भस्मासुर था बड़ा अभिमानी। गौरी को हरने की ठानी।
शिव शंकर ने मति पहचानी,
असुर मन की गति शिव जानी।
नृत्य करन की विधि समझाई,
दुष्ट दमन कर कला दिखाई।
रेखा कह नवाए के माथा,
विधि के हाथ सौंप सब राखा।
रेखा रानी
विजयनगर गजरौला जनपद अमरोहा उत्तर प्रदेश
भारत।

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