साहित्य

दर्प


उदय किशोर साह

मन पे दर्प ना पालिये
कर देता है मन को पागल
झूठी शान व शौकत में
सब कुछ हो जाता है कायल

मन में दर्प ना पालिये
जग बन जाता है बेगाना
नाता अपनों से छुट जाता है
भटक जाता है जीवन का पैमाना

मन में दर्प ना पालिये
दिल में पैदा होता है द्वेष
झूठी  अभिमान की दलदल में
खुशियाँ डूब जाती बदल कर भेष

मन में दर्प ना पालिये
जीवन बुराई से भर जाता है
भग जाती सुख शांति रूठकर
अशांति की सौगात दे जाता है

मन में दर्प ना पालिये
घमंड का बादल छा जाता है
हवा की इक झौंका से जीवन
पल में बिखर चला जाता है

मन में दर्प ना पालये
ये छोटी सी जिन्दगानी है
हँस खेल कर पल गुजारिये
अद्भुत जीवन की कहानी है।

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार
9546115088

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