साहित्य

फिर अपना गांव याद आए

राजेश”बनारसी बाबू”
**वह शंकरपुर वाला अपना गांव फिर याद आए है।
बरगद पेड़ के बाई ओर पगडंडी और बब्बा की कच्ची मड़ई हमे बहुत सुहाए है।
वह बब्बा का रोज मार मार के उठाना ।
फिर खिसियाते हुए उनका यू आंँख दिखाना
उनके उठते ही भागते हुए अम्मा के गले लग जाना।
दिनभर पगडंडी पे कच्ची गोलियां खेलते दिन बिताना।
दद्दा के डंडा पटकते ही पगडंडी के पीछे टीले में छुप जाना।
मुझे याद है वह पगडंडी सालो से कच्ची थी।
दोनो ओर रेलवे क्रॉसिंग फाटक और सामने कच्ची बस्ती थी
एक ओर पहाड़ तो दूजे मंगल चच्चा का ढाबा था।
एक तरफ पगडंडी मुस्कुराती तो दूजे तरफ फसल लहलहाता था
जब बब्बा पीला वाला कच्छा पहनते तो फटा सब नजर आता था।
जब हम हंस्ते तो हमे डाट पड़ जाता था।
अब वह पगडंडी अब खोई नजर आती है।
अब जब रास्ता चलो बड़े बड़े गड्ढे ओर गिट्टी नजर आती है।
यहां की ऊंची नीची सड़क बड़े सताए है।
वो आज पगडंडी और निमिया के पेड़ आज फिर कटे नजर आए है।
मोदी जी के अच्छे दिन सुनके आज मेरे आंँख भर आए है।
हमे अपने पगडंडी वाले दिन फिर याद आए है?
आज प्रशासन ने कैसा बखेड़ा खड़ा किया है।
अपनी पगडंडी को तोड़ कर ये सड़क कैसा खड़ा किया है?
इससे अच्छी अपनी कच्ची पगडंडी थी।
कैसे कल अपनी यहां खेल रही छोटी बच्ची थी
आज यहा सड़क बनाए है कल अपनी छोटी बच्ची खेलते हुए सड़क पे अपनी जान गवाऐं है।
कितनी अच्छी बात थी जब हम सब दोस्त बरगद पेड़ वाले पगडंडी पे मिला करते थे
बगल वाले चिंटू भैया का पैंट खींचा भी करते थे।
जब हम चलते तो जैसे पगडंडी हमसे बाते किया करती थी।
सूरज ढलते ही पगडंडी जैसे इठलाया भी करती थी।
आम के पेड़ पे बैठ कर कैसे मनमानी किया करते थे।
वो पहचान सिमट सी गई अब तो पगडंडी गांव से भी गई है।
पगडंडी पे उठना बैठना लोग का शान हुआ करता था ।
अब तो प्रगति के दुनिया में हम सब बह से गए है?
अपने प्राचीनतम संस्कार को भूल से गए है।
अब तो चारो और सड़क और नाली निर्माण हो गई है।
अपनी कच्ची पगडंडी वाली जैसे रास्ते खो ही गई है।


राजेश”बनारसी बाबू”
उत्तर प्रदेश वाराणसी
8081488312
स्वरचित मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

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