साहित्य

फिर मैं कुछ न कह सकी

लघुकथा


पिंकी सिंघल

बात कुछ वर्षों पहले की है ।उस साल मेरे पास कक्षा 4 हुआ करती थी और मेरी कक्षा में कुल 32 विद्यार्थी होते थे। जैसा कि हम सभी को विदित है कि शिक्षा विभाग, दिल्ली द्वारा प्रत्येक वर्ष सभी छात्रों को निशुल्क पुस्तक एवं कॉपियां वितरित की जाती हैं। उस वक्त भी पुस्तकें वितरित करने का माहौल विद्यालय में था।एक के बाद एक अभिभावक बच्चों की पाठ्यपुस्तकें लेने मेरी कक्षा में आ रहे थे ।लगभग 7 से 8 अभिभावक पुस्तकें ले चुके थे ।अगले छात्र शिवम (बदला हुआ नाम )की माताजी सुंदरी देवी (बदला हुआ नाम) जैसे ही मेरी मेज के पास पुस्तकें लेने आई मैंने रजिस्टर उनके सामने कर दिया और हस्ताक्षर करने को कहा। सुंदरी देवी निशब्द खड़ी रही मैं अलमारी से पुस्तकें निकाल ही रही थी कि अचानक मेरी नजर सुंदरी देवी पर पड़ी जिन्होंने अभी तक पुस्तक वितरण रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर नहीं किए थे। मैंने उनसे दोबारा हस्ताक्षर करने को कहा, परंतु उन्होंने ना में अपनी गर्दन हिला दी ।मैं समझ गई कि वह लिखना पढ़ना नहीं जानती हैं। शिवम भी उस वक्त अपनी माता जी के साथ मेरी टेबल के पास ही खड़ा हुआ था और उनके चेहरे के हाव भाव भली प्रकार पढ़ पा रहा था ।

खैर ,मैंने टेबल की दराज से स्टांप पैड निकालकर टेबल पर रखा और अंगूठा लगाने के लिए कहा ।जैसे ही सुंदरी देवी ने उस स्टांप पैड पर अपना अंगूठा टिकाना चाहा ,मैंने स्टांप पैड अपनी तरफ खींच लिया ।वह हैरान रह गई, उसकी आंखों में एक प्रश्न था अर्थात वह मुझसे पूछना चाह रही थी कि मैंने स्टांप पैड अपनी तरफ वापस क्यों खींचा ।इससे पहले वो मुझसे कुछ कहतीं ,मैंने उनसे कहा कि इस बार तो मैं आपको अंगूठे के निशान लगाने मात्र से ही शिवम की पुस्तकें दे रही हूं ,परंतु अगली बार जब आप आएंगी तो बिना हस्ताक्षर के मैं आपको किताबें या कॉपियां नहीं दूंगी।यह सुनकर सुंदरी देवी हल्का सा मुस्कुराई और अंगूठा लगा पुस्तकें लेकर वहां से चली गई।मैं कुछ पलों के ही बाद इस वाकया को भूल गई।

अगले ही दिन से शिवम ने स्कूल आना बंद कर दिया। 1 दिन, 2 दिन ,4 दिन, 1 सप्ताह वह स्कूल नहीं आया ।मुझे लगा कि शायद उसकी तबीयत खराब होगी इसलिए वह स्कूल नहीं आ रहा है और सच कहूं तो मैंने उसके विद्यालय में आने का कारण उस वक्त गंभीरता से जानना भी नहीं चाहा क्योंकि मुझे यही लगा कि शायद वह स्वस्थ होकर वापिस स्कूल आ जाएगा। परंतु 15 दिन बीतने के बाद भी जब शिवम विद्यालय नहीं आया तो मेरी चिंता बढ़ने लगी और कक्षा में पढ़ने वाले उसके पड़ोस के छात्रों से मैंने शिवम के बारे में पूछताछ की ।सभी छात्रों ने कहा कि शिवम बिल्कुल ठीक है और वह तो बीमार नहीं है।तब जाकर मेरी सांस में सांस आई।

चूंकि, बच्चों का स्वभाव चंचल होता है एवं स्वयं को सर्वश्रेष्ठ दिखाने का भाव उस उम्र के सभी बच्चों को होता है जिसके चलते छात्रों ने यह तक कहा कि मैम शिवम पढ़ने से बचना चाहता है ताकि वह छुट्टी मारकर घर में सारा दिन खेल सके इसीलिए वह शायद स्कूल नहीं आता है। मुझे उनकी बातों पर हंसी आई,परंतु एक प्रश्न मेरे मस्तिष्क में लगातार घूमता रहा कि आखिर क्या वजह है कि शिवम स्कूल नहीं आ रहा है ।शिवम पढ़ने में बड़ा होशियार था इसलिए मुझे उसका विद्यालय ना आना अब बहुत ज्यादा अखर रहा था ।उस समय इक्का-दुक्का बच्चों के ही मोबाइल नंबर विद्यालय रिकॉर्ड में होते थे। जब शिवम 18 दिन तक स्कूल नहीं आया तो मैं अपने विद्यालय के अनुचर श्री कर्म सिंह(बदला हुआ नाम) के साथ शिवम के घर गई क्योंकि इससे ज्यादा इंतजार मैं अब शिवम का नहीं कर सकती थी।मेरे दिलो-दिमाग में एक अजीब सी बेचैनी रहने लगी थी ।जैसे ही हम लोग उसके घर पहुंचे उसके घर पर केवल उसकी 6 वर्षीय छोटी बहन ही थी जिससे हमें कुछ खास जानकारी नहीं मिल पाई और हम अनमने मन से वापिस विद्यालय आ गए।

ठीक 20 दिन के पश्चात जब शिवम सोमवार को विद्यालय आया तो उसे देखकर सभी बच्चे बहुत खुश थे और उन सभी से ज्यादा खुश शायद मैं थी। मेरे मन में चल रही हलचल शांत हुई। प्रार्थना स्थल पर शिवम को देखकर मुझे गज़ब का सुकून महसूस हुआ ।कक्षा कक्ष में पहुंचने के पश्चात मैंने सभी बच्चों की उपस्थिति दर्ज की और गणित के कुछ सवाल हल करने के लिए सभी बच्चों को दिए। हालांकि मैं उस दिन हिंदी का पाठ पढ़ाने के मूड में थी परंतु बाकी बच्चों को व्यस्त कर मैं शिवम से उसके इतने दिन विद्यालय न आने का कारण जानना चाहती थी ,सो मैंने बाकी बच्चों को सवाल हल करने के लिए कहा और शिवम को कक्षा के बाहर आने को कहा। शिवम डर गया कि शायद मैडम इतने दिन विद्यालय में उसके अनुपस्थित रहने की वजह से गुस्सा करेंगी और वह सहमा सा बाहर आया। मैंने शिवम से उसके घर के सभी सदस्यों के हाल चाल के बारे में पूछा और साथ ही आने वाले विद्यालय वार्षिकोत्सव के संबंध में जानकारी देते हुए उसे उसके हेतु तैयारी करने को कहा।

बातों ही बातों में जब मैंने शिवम से उसके इतने दिन विद्यालय से गायब रहने का कारण पूछा तो शिवम पहले तो चुप रहा, परंतु मेरे बार बार पूछने पर शिवम ने बताया कि जिस दिन मेरी माता जी विद्यालय में उसके लिए पुस्तकें लेने आई थी और अपने हस्ताक्षर नहीं कर पाई थी और आपने कहा था कि जब आप अगली बार आओगी तब मैं हस्ताक्षर के बिना आपको कॉपियां नहीं दूंगी,बस उसी दिन मैंने निश्चय कर लिया था और खुद से वादा भी कि जब तक मैं अपनी माता जी को उनका नाम लिखना नहीं सिखा देता तब तक मैं विद्यालय नहीं जाऊंगा।

यह मेरा खुद से खुद का किया हुआ वादा था और जिस दिन मेरे प्रयासों द्वारा मेरी माता जी को अपना नाम लिखना आ गया, मेरा खुद से किया यह वादा पूरा हुआ और उसके अगले ही दिन से अर्थात आज से मैंने विद्यालय आना फिर से शुरू कर दिया ।इतना कहकर शिवम वापस कक्षा के भीतर जाकर अपनी सीट पर बैठ गया और मेरे द्वारा दिए गए गणित के सवालों को हल करने लगा।

परंतु ,शिवम की यह बात सुनकर मैं गदगद हो गई और मुझसे कुछ बोलते नहीं बना ।उस वक्त मेरी आंखों में नमी के साथ-साथ खुशी की चमक भी थी।

कुछ समय पहले मुझे पता चला कि शिवम दिल्ली के एक प्रशिक्षण संस्थान आईटीआई से डिप्लोमा कोर्स कर रहा है ।सचमुच यह मेरे लिए अति गर्व की बात है।

यह घटना मेरे जीवन की खूबसूरत घटनाओं में से एक है जिसे मैं कभी भी भुलाना नहीं चाहूंगी।

पिंकी सिंघल
अध्यापिका
शालीमार बाग दिल्ली

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