साहित्य

फूल खिलेंगे उपवन में

माला अज्ञात

ये बस अँधियारी रात है
पूरा जीवन ही त्रास नहीं
सुबह हो सूरज न निकले
ऐसी तो कोई बात नहीं

छुपे हुये है बीज खुशी के
गहरे मन की धरती में
आशा पले होंगे अंकुरित
फूल खिलेंगे उपवन में
मन कभी डर जाता है
रितु कर दे न घात कहीं
सुबह हो सूरज न निकले
ऐसी तो कोई बात नहीं

रोकर क्यूँ याद करें उनको
खुशियां ही बाँटी है जिसने
आँसू हमारी आँखों के
अपनी अँजुरी भरे उसने
बात अलग ठोकर लगने पर
सँभाले अब वो हाथ नहीं
सुबह हो सूरज न निकले
ऐसी तो कोई बात नहीं

ज्यों धरा घुमती धुरी पर
समय पर बदल देती मौसम
ये दौर स्वतः ही बदलेगा
आज भले चाँदनी है मध्दिम
ये कल इतिहास कहलायेगें
जो होंगे अपने साथ नहीं
सुबह हो सूरज न निकले
ऐसी तो कोई बात नहीं

एक आँख रोती है फिर भी
हँसना पड़ता है दूजे से
खिल रहे जो नित नये फूल
देना है सम्बल सूझबूझ से
सींच जड़ो को आशाओं से
देना अश्रु बरसात नहीं
सुबह हो सूरज न निकले
ऐसी तो कोई बात नहीं

 ....
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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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