साहित्य

गज़ल

डॉ.गोरथनसिंह सोढा 'जहरीला'

मुठ्ठीभर रोशनी ही काफी मार्ग प्रशस्त करने के लिए।
एक चौकीदार ही काफी देश उन्नत करने के लिए।।

देश समाज के लिए जिये वही तो जिन्दगी है।
एक ही जोगी काफी चेला सिद्धहस्त करने के लिए।।

कुछ कर गुजरने के लिए मोह त्यागना पड़ता है।
खुद की बली चढानी पड़ेगी सैरे- जन्नत करने के लिए।।

‘जहरीला’ सबका साथ सबका विकास करना मुश्किल आज कल।
युग बीत जाते सबकी पूरी मन्नत करने के लिए।।

डॉ.गोरथनसिंह सोढा ‘जहरीला’
जिलाध्यक्ष
अखिल भारतीय साहित्य परिषद
बाड़मेर राजस्थान

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