साहित्य

ग़ज़ल

सुभाषिनी जोशी ‘सुलभ’

कहाँ खो गया मेरा मस्तियों का वतन।
महकती-चहकती सी बस्तियों का वतन

बावड़ी घाट व पनघट सूने पडे़ हैं,
वो नदियों तालाबों कश्तियों का वतन।

अटूट श्रद्धा होती जहाँ देवियों पर,
कहाँ है गया मेरा शक्तियों का वतन।

मनते तीज-त्यौहार, उत्सव, जगराते,
कोई ढूंढे मेरा भक्तियों का वतन।

प्रार्थनाओं में जो उतराता रहता,
नमाजों ,अजानों ओ घण्टियों का वतन।

क्या गलती हमसे हुई है परमात्मा ,
किसने बनाया इसे सिसकियों का वतन।

कोई तो अदृश्य शक्ति उभरकर आए,
कहाँ मिलेगा मेरा हस्तियों का वतन।

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