साहित्य

गुरू वन्दना

नीरज कुमार द्विवेदी

जन्म दिए माता-पिता, दिया गुरु ने ज्ञान।
गुरू दृष्टि पड़ती नहीं, नहि मिलता यह मान।।
जग में यश कारक वही, दूजा और न कोय।
जिस पर कृपा करें गुरू, जग में कीरति होय।।
सुर-असुर पूजें जिनको, गुरू एक बस नाम।
उनसे बड़ा न तीर्थ है, उनसे बड़ा न धाम ।।
शरण गुरू के जो गया, छोड़ जगत का प्यार।
जन्म-मरण भव से सदा, उसका बेड़ा पार।।
भव्य रूप देकर हमें, गुरु करें उपकार।
कर्ज भरेगा कोइ क्या, कितने ले अवतार।।
नीरज कुमार द्विवेदी
गन्नीपुर-बस्ती, उत्तरप्रदेश

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