साहित्य

हमनवा बनकर मिला कीजिए

अनुपम चतुर्वेदी

प्रेम की बात , ऐसे ही मत कीजिए,
प्रेम क्या है?इससे भी सिलसिला कीजिए।

केवल हवा में उड़ना गलत बात है,
जमीन से जुड़कर भी चला कीजिए।

आज मैंने भी तोड़ दी है चुप्पी अपनी,
अब अपने हद की , इत्तिला कीजिए।

मान-मर्यादा की कसौटी पर मैं ही क्यों?
आप भी कभी खरा-खरा मिला कीजिए।

एक गाड़ी के पहिए जब बने हम दोनों,
उसे ध्यान में रखकर,शिकवा-गिला कीजिए।

जिनको जन्नत की चाहत है हर सूं,
सबसे हमनवा बनकर मिला कीजिए।

पाबन्दियां भी जरूरी हैं कभी-कभी,
बस जद्दोजहद में न फ़ैसला कीजिए।

कितनी हसरत से चूमा है तेरी पेशानी को,
अब इसकी गैरत पर मत हमला कीजिए।

आइए अब ताज़ी आबो-हवा में टहलें,
लेकर हाथों में हाथ अब चला कीजिए।

अनुपम चतुर्वेदी ,सन्त कबीर नगर, उ०प्र०
रचना मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित
मोबाइल नं ०- 9936167676

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