साहित्य

इस बार फसली कमाई कितनी

श्रीकांत यादव

खेतों का मालिक
आंखों का नमींदार
बांहों का फौलादी
राजनीति से दूर
पकाता है फसलें
सुगबुगातीं हैं बातें
बंध जाती है घंटी
तब राजनीति के गले में!

फनफनाती मंडियां
जोश खाते आढ़तिए
होश में आते सटोरिए
मौजियाते साहुकार
तरुणाई में सरकारी महकमे
लगते किसानों के भले में!

किसी की रुकसत नहीं
किसी को फुरसत नहीं
होता है झमेला
लगता है मेला
खरीददार ढूढें बोरा
करें विनती निहोरा
गोदाम में सिर धूनें
करके रोशनी को दूने
जगमगाते बल्ब के भी जले में!

उधर गोदाम में बनियां
इधर किसान की रमजनियां
कहां रखेंगे अनाज सोचें
चिंता में सिर के बाल नोचें
जंचे गोदाम की न पोताई
जंचे खलिहान की न लिपाई
दोनों मन में चिंता,
न कोई गड़बड़ी हो!
आए न मुसीबत,
कोई उठ खडी़ हो!
सोचकर हैं परेशान इस सिलसिले में!

सरकार की तरफ से,
दोनों अनमने हैं!
कानून के बदले,
अधिनियम जो बने हैं!
इस बार होगी फसली कमाई कितनी
किस्मत की मेहरबानी होगी जितनी
यदुवंशी यही बड़ा पेंच है
आगे तो बडा़ खेचम खेंच है
एक की मुसकान मखमली है
दूसरे की जैसे ड़लों की गली है
एक है स्थाई धनवान भी है
दूसरा रहता सदा जलजले में!
लगाता है फंदा अक्सर गले में!!

श्रीकांत यादव!
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी 326, दीपक विहार
खोड़ा,गाजियाबाद
उ०प्र०!

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