साहित्य

जननी

नीलम राकेश

तुम ही अंदर
तुम ही बाहर
तेरी ही परछाईं मैं।

बनती रही
संवरती रही
तेरे आंचल की
छांव में।

मेरे पग
चुभें न कंटक
रही बुहारती
पथ बाधाएं तुम।

तपती धूप और
जीवन के झंझावातों में
वटवृक्ष की छांव सी
मुझे दुलारती तुम।

मेरे विश्वास]मेरी उडान मे
विधाता का
वरदान तुम।

कैसे करूँ
बयां मैं
क्या हो
तुम मेरे लिए।

मां]तुम ही अंदर
तुम ही बाहर
तेरी ही परछाईं मैं।

नीलम राकेश
लखनऊ

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