साहित्य

ज्योति सिन्हा की कलम से

लगते रहस्यमय तुम

आज की
गहरी बातों से..
आंखें डबडबा गई
और
शब्द मौन रहे ,,
एक बार फिर से
सोचते हैं…
कौन हो तुम हमारे
और
हम तुम्हारे कौन हैं …
क्यों
हारते हैं
जानबुझ कर भी
तुम्हारे सामने,,
झुक जाते हैं
आंखें बंद कर ,,
आखिर क्या रहस्य है
क्या है बातें ऐसी
कि
रहते हैं झुक कर
और
तुम रहते हो तने-तने
ना दिखती तुममे
कोई चंचलता-चपलता
ना दिखता तुम्हारा
अनुनय विनय
और
रहते भी हो अनमने से तुम,
लगते हो बहुत रहस्य मय……

गहरे जख्म

जिसने कि हमसे मोहब्बत जितनी ज्यादा ,
उसने ही दिए उतने गहरे जख्म…

उसने समझा पहचान नहीं हमको ,
पर,निकले इतने नादान नहीं हम…

आंखें बंद करके हम तो मुस्कुराते रहें ,
पर,उसकी बेवफाई से अनजान नहीं हम…

चुप थे हम इश्क वाले ख्यालों में गुम नहीं थे ,
जब चुभते थे हमको वो गहरे जख्म…

हमने राह बदली , साथ भी छोड़ा ,
उससे किया किनारा थोड़ा-थोड़ा…

जिसने ,जख्म दिया हमको इतना गहरा,
हमने नहीं बिठाया उस पर नजरों का पहरा…

कैसे उसे निकाले हम अपने दिल से ,
वही तो हमारा पहला आशिक ठहरा…

माना दिया दर्द उसने हमारी वफा को,
उसको दुआ देते हैं फिर भी हमारे गहरे जख्म…

ज्योति सिन्हा
मुजफ्फरपुर
बिहार

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