साहित्य

जीवन का उद्देश्य क्या है

शास्त्री सुरेन्द्र दुबे अनुज जौनपुरी की कलम से

जीवन के उद्देश्य को,
प्रथम ही लीजै जान।
जग वैभव तन महल पर,
होये ना मन अभिमान।।

जीवन का उद्देश्य सरल है।
सत्कर्मों का मीठा फल है।।

नहीं हमारा आज और कल है।
सोच सोच मन काहें बिकल है।।

भूत भविष्य की चिंता छोड़ो।
वर्तमान से नाता जोड़ो।।

मायावी संसार में,
क्यों भटकें नहीं सुजान।
उर कर जागृत चेतना,
लो महा रहस्य को जान।।

वर्तमान में जन्म है होता।
जीवन वर्तमान में खोता।।

जान लिए जो इस रहस्य को,
वह जन्म मरण से मुक्त है होता।
चैतन्य प्रभु के शरणागत होकर,
आवागमन से मुक्त है होता।।

यही मोक्ष का द्वार कहाता।
लख चौरासी भटक ना पाता।।

जन्म-मरण के बन्ध से,
नर कैसे होये मुक्त।
कैसे जीवन जग जी सके,
विकार रहित उन्मुक्त।।

जिसने स्वयं को जान लिया,
उस आत्मा को पहचान लिया।
वह जन्म- मरण का काट बंध,
स्व मोक्ष जीव वह थाट लिया।।

ना भय – चिंता किसी बात की।
ईर्ष्या – मोह ना किसी सौगात की।।

समदर्शी बन जीवन जगता।
सदा दूर आसक्ति से रहता ।।

दुःख क्यों है संसार में,
क्यों जीवन है दुश्वार।
जिसके रहते जीव का,
जीवन नर्क का द्वार।।

लालच, स्वार्थ और भय
भारी।
दुःख का मूल अहित जगकारी।।

जो उपजे हिये अमंगलकारी।
त्यागे जीव जीवन सुखकारी ।।

क्या ईश रचे दुःख की संरचना ?
अथवा जीवों की है यह रचना ??

जग ईश्वर की अद्भुत संरचना।
सुन्दर सरस मनोहर दसना ।।

धरती अंबर नदी कूप तड़ागा।
गिरि वन उपवन पुष्प परागा ।।

मानव हित निर्मित कर साईं।
सुखानुभूति नर हेतु बनाई।।

सुख दुःख जग नर स्वयं बनाये।
कर्म अनुरुप सदा फल पाये ।।

ईश्वर की अनुकंपा त्यागे।
मति अनुरूप जग रचे अभागे।।

क्या ईश्वर का अस्तित्व है ?
कौन है क्या उसका रुप?
वह स्त्री या है पुरुष ?
या अनंत अलक्ष्य स्वरुप ??

जैसे नींद के बिना नहीं कोई सोता है।
बिना कारण के बिना कार्य नहीं होता है। ।

यह संसार उस कारण के,
अस्तित्व का प्रमाण है।
तुम हो तो इसलिए वो भी है,
आध्यात्म में ‘ईश्वर महान है।।

ना वह स्त्री है और ना ही पुरुष है।
विश्वास और आस्था के जीवन का अनंत रूप है।।

भाग्य क्या है ?

हर क्रिया हर कार्य का,
होता एक परिणाम है।अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है।।

परिणाम ही आज का भाग्य है।
प्रयत्न ही कल का भाग्य है।।

रोज़ मरते हजारों-लाखों,
देखते सब लोग हैं।
चिरकाल जीवन जिंदगी का ,
चाहते सब लोग हैं।।

जीव की इच्छा यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।
शीघ्र पाने की ललक में टूटता सबका धैर्य है ।।

सुविचार सुख मूल है,
लोभ दुखों की खान।
क्रोध गंवाये दुःख नहीं,
धर्म दया बढ़ जान ।।

किसी को धोखा कष्ट न दीजै।
इज्जत दीजै हाय न लीजै ।।

मजबूरी सब कुछ करवाता।
अपराजिता सच समझ न आता ।।

मंहगा झूठ बिके जग सारे।
सत्य बिके नहिं सांझ सकारे।।

मोह परा नर अंधा होई।
परोपकार सम और न कोई।।

स्वप्न न बेचा जा सके,
मौत न रोकी जाय।
मूर्ख न समझे मूर्खता,
समय न रोका जाय ।।

नश्वर नहीं है आत्मा, और नश्वर नहीं है ज्ञान।
नश्वर देह संसार है,
काहें करे अभिमान।।

अनुज कहें इस सार को,
जीवन लेहु उतार।
सुन्दर अति लगने लगेगा,
यह जीवन संसार ।।

@काव्यमाला कसक

kavyamalakasak.blogspot.com

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