साहित्य

जुड़वा

लघुकथा

सपना चन्द्रा


अपनी बेटियों को हँसते खेलते देख रीमा और रोहित फूले नही समा रहे थे।
“रीमा याद है न इनके जन्म के समय तुम्हें कितनी चिन्ता हुई थी!”
“हां !,अच्छी तरह याद है!सब याद है।”
याद करते हुए………
रोहित के घर जब दो जुड़वा बेटियों की आगमन की बात सबने सुनी तो हर्ष की जगह चेहरे उतर गए थे।
इससे पहले भी रोहित की माँ ने बहू रीमा की किसी तरह जांँच करवाई थी, जिसमें कन्या भ्रूण के पता चलते ही रीमा को अपने बच्चे से हाथ धोना पड़ा था।
इस बार रोहित ने ,अपनी पत्नी के र्गभधारण करने के बाद यह निश्चय कर लिया था कि माँ को मनमानी नही करने दूंगा।
रीमा के डिलीवरी के बाद शल्यकक्ष से बाहर आकर जब डॉक्टर ने कहा,”मुबारक हो .,दो कन्या रत्न है .,रिद्धि और सिद्धि की तरह!,
रोहित के तो मानो पैर जमीन पर नही थे.,”दो दो बेटियों का पिता बन गया मैं “,वह कई बार दुहराता रहा।
अपनी पत्नी को खुशखबरी देने और गले लगाने को बेताब था।
अंदर जाकर वह.,”रीमा हमदोनों दो दो बेटियों के माता पिता बन गए!”
“पर मांँजी?”
“मांँ को मै समझा लुगांँ तुम टेंशन न लो।”
“बेटियाँ मेरी है तो दायित्व भी मेरा है।”
“रोहित जो बच्ची हमसे दूर कि गयी थी वो फिर वापस आ गई अपनी बहन के साथ ताकि हम अपनी भूल को स्वीकार कर सकें।”
“हां रीमा!.,सही कह रही हो ,मुझे अपनी बेटियों के लिए एक ऐसा बगीचा बनाना है,जहाँ वो अपनी मर्जी से खिल सकें।”


सपना चन्द्रा
कहलगांव ,भागलपुर, बिहार

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