साहित्य

“कागज़ की नाव”

‌साधना मिश्रा” लखनवी”

मम्मा ,मम्मा, देखो आज फिर जोर की बारिश हो रही है । मैं आज फिर से खूब सारी नाव बनाऊंगी कागज़ की। अभी लास्ट शनिवार को ही तो आर्ट वाली मैडम ने कागज की नाव बनानी सिखाई थी।
8 साल की शिवानी अपनी खुशियों में डूबती हुई लॉन में जमे हुए पानी में नाव चलाने के लिए आतुर हुई जा रही है। और मम्मा को सब काम छोड़ कर अपना साथ देने के लिए मजबूर कर रही थी।

‌ आज अपनी बिटिया को बचपन की बारिश में कागज की नाव चलाते देखकर शारदा भी अपने उन यादों में चली गई जब अपनी ओझल होती ,हिचकोले खाती, डगमगाती , डूबती नाव को देखकर रोने लगी थी , तो मां ने कैसे उसे उलझनसे निकालने तरकीब बताई थी।
डगमगाती, डूबती, हुई नाव का फिर से सीधी हो जाना दिखा कर माँ ने यही तो बताया था कि जिंदगी के सफर में भी ऐसी उलझने आती है , ।धैर्य से कोशिश करते हुए हम उन संघर्षों से कैसे निकल जाते हैं, जैसे मेरी कागज की नाव बार-बार सीधी होकर आगे बढ़ती जा रही थी , मां मुझे उसी प्रकारआगे बढ़ने का संदेश दे रही थी ।
सोच में डूबी हुई थी शारदा कि अचानक शिवानी भी जोर जोर से चिल्ला पड़ी।
मां मेरी नाव डूब रही है , । उस प्यारी नाव को देखकर उसका जोर जोर से रोना शुरू हो गया ।

‌ ……आज शारदा भी अपनी मां द्वारा दिया गया संदेश अपनी बिटिया को शिवानी को हस्तांतरित कर रही थी , धैर्य रखने के लिए ,हमेशा उत्साहित रखने के लिए ।

‌ शिवानी अपनी नाव को भी देख रही थी और बातें भी सुन रही थी ,अचानक सीधी हुई नाव देखकर उछल पड़ी ,खुश हो गई। मेरी कागज की नाव चल पड़ी । और बार ताली बजाकर नाच रही थी।
‌…… माँ शारदा उसे आगे आने वाली परेशानियों से बचने का संदेश बता रही थी रह कि तुम अगर हमेशा अपने जीवन में इन संघर्षों को सहन करके , आशावादी रहकर काम करोगी तो सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी ,और तुम इसी प्रकार जीवन की नाव पर कुशलता से चलती हुई अपने मुकाम में सफलता हासिल करोगी।।
‌ बचपन की सीख जो मुकाम तक पहुंचा दे ।

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