साहित्य

कहांँ जाकर बैठ गए हो

वन्दना खरे मुक्त

आओ प्रीतम मेरे नैना तेरा रास्ता निहारे ,
क्यों चले गए कहांँ चले गए तुम,,,,,
इन नैनो में बिरह वेदना नजर नहीं आई तुम्हें,
इतनी पीड़ा इतना दर्द कैसे सहूँ में बिन तुम्हारे,,
कहांँ जाकर बैठ गए हो,,
तुम प्यार भरी बातों को भूल गए
तुमको जाना ही था दूर तो क्यों?
क्यूँ दिल लगा बैठे हो..,..
दुनिया बस तेरी ही खातिर
खुले आकाश में उड़ रहे हो
मेरे हर सपने को जी रहे हो तुम
तुमको जाना ही था दूर तो
क्यों दिल लगा बैठे हो तुम…
सारी बातों बातों में कटी राते
सारी दिल पर लगे आ गई हैं,
तुमको जाना ही था दूर तो क्यों?
दिल लगा बैठे हो तुम….
उठती हूंँ मैं विरह में जलती हूंँ मैं
कान्हा तेरे बस प्रेम में बहती हूंँ मैं
दिए में बाती सी जलती रहती हूँ
तुमको जाना ही था दूर तो क्यों
दिल लगा बैठे हो तुम….,
बिरह वेदना में कितना दर्द है
दर्द को जीती और पीती हूंँ मैं
यही सोचती रहती हूंँ मैं ,,,,
तुमको जाना ही था दूर तो
क्यों दिल लगा बैठे हो तुम…
आओ प्रियतम मेरे नैना रास्ता निहारे,
विरह वेदना में जल रही हूंँ,
कब आओगे कब आओगे,,,।।

वन्दना खरे मुक्त

समाज सेविका

चचाई जिला अनूपपुर

मध्य प्रदेश

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!