साहित्य

कलमकार का युद्ध


 आर. आर. झा (रंजन)
बनाकर शस्त्र कलम को कागजों के ढाल से हमने
लड़े हैं युद्ध लाखों काल के संग्राम में हमने
नहीं योद्धा, नहीं सेना, बिना रणक्षेत्र में उतरे
किए प्रहार अचूक वो शब्दों के तीखे बाण से हमने
मिटा दी हस्ती ताजों की, पलट दिए सत्ता लेकिन
बहाए ख़ून बिन गहरे दिए हैं घाव मगर हमने
बनाकर शस्त्र कलम को कागज़ों के ढाल से हमने।
 
पीकर आँखों के आँसू को हम जज़्बात लिखते हैं
किसी राधा, किसी मीरा के मन की प्यास लिखते हैं
मगर अबतक अधूरी जो यहाँ है वो कहानी हम
जबकि हर कहानी के हम आदि-अन्त लिखते हैं
युगों के चाल पर चलकर लिखे हैं ग्रंथों को हमने
मगर बिन युद्ध लड़े, जीते महाभारत भी हैं हमने
बनाकर शस्त्र कलम को कागज़ों के ढाल से हमने।
 
हम शृँगार रस के नायक हैं, हास्य कमान हमारी है
वीर रस के तरकश में तैयार हरदम व्यंग्य-बाण हमारी है
मगर हम भक्ति रस के फूलों से वतन की पूजा करते हैं
उसी फूलों को बनाकर शूल, शत्रु पर प्रहार करते हैं
यूँ तो गौतम बुद्ध बसाए हुए हैं अपने तन-मन में हमने
मगर आज़ाद को भी दिल में दिए स्थान हैं हमने
बनाकर शस्त्र कलम को कागज़ों के ढाल से हमने।

आर. आर. झा (रंजन)
बड़ीबन-सहसोल, सहरसा-852129 (बिहार)
98 99 415 201, 89 208 10 672

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