साहित्य

कमलेश मुद्ग्ल की कलम से

जीना सीख ले

जिन्दगी मिली है,

जीना सीख ले

बात बात पर

क्यों होते उदास

हर पल हँसना

सीख ले

बहुत ही छोटी जिन्दगी

छोटी सी इसकी कहानी

कदम दर कदम गिरना उठना

इसमें क्यों उलझना

बातों को दिल से मत लगा

अपने लिए कहना सीख ले

अपने हिस्से के कर्म किए जा

वो क्या है, क्या करता

मत बन उनकी तरह माफ़ कर,

आगे बढ़ अपनी कद्र करना सीख ले

काँटे बहुत हैं राह में

पत्थरो से भी बच बच कर

चल अपने दामन को बचा

मस्त हो कर चलना सीख ले

सीखूं हर दम खुश रहना

सीखूं हर दम खुश रहना

मालूम नहीं कब समय बीत जाये

दुःख भी आये सुख भी आये

समय का पहिया चलता जाये

जो बातें दिल पर करें वार

मनन करू हर बार

कुछ पल रहती उनके साथ

छोड़ कर दामन उनका उठती हूँ,

हर बार नये पल ढूँढू,

जीने का मिले संबल

नाव यह करती, खुशी से पार

लगते हैं, कभी हिचकोले

गिरती हूँ, संभलती हूँ हर पल

अब चलती हूँ जीवन के

इस पड़ाव पर

मानू नहीं कभी भी हार

कमलेश मुद्ग्ल

( दिल्ली)

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