साहित्य

कवि कमलाकर त्रिपाठी की कलम से

स्वावलंबी

दृढ़ संकल्प हो चाह कर्म की,
हर मनोकामना पूरी होती,
जीवन सहज सरस है रहता,
औ इच्छाएं न अधूरी रहती,
इच्छाएं न अधूरी रहती,
है अंतस से रहता अडिग दृढ़,
कहते ‘कमलाकर’ हैं आजीवन,
स्वावलंबी रहता प्रतिज्ञ दृढ़।।

साथ

सोचा था मैंने जीवनमें,
मेरा साथ निभाएंगे वो,
दुख-सुख, अकाल-दुकाल में,
अपना हाथ बँटाएंगे वो,
अपना हाथ बँटाएंगे वो,
पर असमय काल ने दे दबोचा,
कहते ‘कमलाकर’ हैं क्या कहूँ?
ऐसा कभी नहीं था सोचा।।

शक्ति

शक्ति हमें दो हे! दाता मेरे,
कृपा- दयादृष्टि तुम्हारी बनी रहे,
सहज चलता रहे जीवन ये मेरा,
औ भय-भ्रम-बाधा न कभी रहे,
भय-भ्रम-बाधा न कभी रहे,
रहे निर्बाध नित मेरी अनुरक्ति,
कहते ‘कमलाकर’ हैं सविनय,
कभी क्षीण न हो हमारी शक्ति।।

सोच

चले गए न रहे वो दिन,
लौटकर पुनः कहाँ आयेंगे,
बचपन गया, यौवन गया,
अब तो बुढ़ापा संग निभायेंगे,
अब तो बुढ़ापा संग निभायेंगे,
है सोच रह गई शेष भले,
कहते ‘कमलाकर’हैं जीवनके,
वोओज-उमंग सब गए चले।।

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