साहित्य

कवि कमलाकर त्रिपाठी की कलम से

कविता

उरपुर की उद्गार है कविता,
शब्दों का शृंगार है कविता,
रस -छंद -अलंकार से परिपूर्ण,
अनुभव का आधार है कविता,
अनुभव का आधार है कविता,
है कविता संग चलता लय-सुर,
कहते ‘कमलाकर’ हैं कविता से,
अति आह्लादित होता उरपुर ।।

गुरु

पूजनीय – समदर्शी हैं गुरु हमारे,
हम पूजन-अर्चन करते सम्मान,
हैं पथप्रदर्शक वो बीच हमारे,
औ मिटाते सारे अघ -अज्ञान,
मिटाते सारे अघ – अज्ञान,
हैं दिव्यज्योति देते आदरणीय,
कहते ‘कमलाकर’ हैं सविनय,
हैं त्रिदेव सम सदा पूजनीय।।

सहनशीलता

सहनशीलता – धीरता है जिसमें,
जीवन निष्फल हो सकता नहीं,
कभी भय-भ्रम न रहता मनमें,
औ कष्ट – क्रंदन हो सकता नहीं,
कष्ट – क्रंदन हो सकता नहीं,
है रहती नहीं कभी उदासीनता,
कहते ‘कमलाकर’ हैं जीवन सदा,
प्रमुदित रखती है सहनशीलता।।

अतिथि

देव समान हैं अतिथि हमारे,
सेवा – सत्कार करें सम्मान,
बिन सेवा के लौट न जाऐं,
इसका रखें हर कोई ध्यान,
इसका रखें हर कोई ध्यान,
जीवन सफल बनाऐं स्वमेव,
कहते ‘कमलाकर’ हैं जीवनमें,
अतिथि को मानें सभी देव।।

ध्यान

बंदे हैं हम तेरे प्रभु,
करते सदैव तेरा ध्यान,
भजन -कीर्तन करते हम,
औ करते हैं तेरा गुणगान,
करते हैं तेरा गुणगान,
सुख – शांति हमें दे दें,
कहते ‘कमलाकर’ हैं हम,
आजीवन रहेंगे तेरे बंदे।।

मन

चंचल मन है कारण सबका,
कभी वश में है रहता कहाँ,
है चलता रहता ये आठोंयाम,
औ चक्कर लगाता यहाँ-वहाँ,
चक्कर लगता यहाँ – वहाँ,
है करता सबको ये विकल,
कहते ‘कमलाकर’ हैं कभी,
कहाँ ठहरता है ये मन चंचल।।

कवि कमलाकर त्रिपाठी.

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!