साहित्य

कवि कमलाकर त्रिपाठी की कलम से

सत्कर्म

सत्कर्म ही है धर्म – कर्म,
है नरता – सेवाधर्म – पूजा,
मुक्तिमार्ग है यही जीवन का,
अन्य उपाय नहीं है दूजा,
अन्य उपाय नहीं है दूजा,
आजीवन करें सभी सत्कर्म,
कहते ‘कमलाकर’ हैं हमारा,
सुख-शांति-वैभव है सत्कर्म।।

सनातनधर्म

धर्म सनातन की अवहेलनामें,
संस्कृति-संस्कार का हो रहा ह्रास,
कलयुग के इस दुष्प्रभावसे,
है फैला चतुर्दिश आतंक – त्रास,
है फैला चतुर्दिश आतंक – त्रास,
भ्रष्टाचार-पापाचार हो रहा अधर्म,
कहते ‘कमलाकर’ हैं जनहितमें,
सदा हितकर रहा है सनातनधर्म।।

सोच

सकारात्मक सोच रहे मनमें,
औ सबके संग हो सद्व्यवहार,
सहज सरस रहेगा जीवन,
जब अच्छा होगा सोच-विचार,
जब अच्छा होगा सोच- विचार,
विकास वर्धन होगा गुणात्मक,
कहते ‘कमलाकर’ हैं जीवनमें,
यदि सोच रहे सकारात्मक।।

आत्मतुष्टि

प्रभु ने दिया है हमें जो कुछ,
सहर्ष स्वीकार करो जीवनमें,
उसे भोग-उपभोग करो सदा,
औ आत्मतुष्टि रखो मन में,
आत्मतुष्टि रखो मन में,
हैं रक्षा – देखभाल करते प्रभु,
कहते ‘कमलाकर’हैंआजीवन,
सबका साथ निभाते प्रभु।।

आस

नितआस लगाए रहता जीवन,
पर नश्वर तन का विश्वास नहीं,
आत्मा अजर-अमर है शाश्वत,
कभी होता इसका नाश नहीं,
कभी होता इसका नाश नहीं,
छोड़कर आस, रहें निश्चिंत,
कहते ‘कमलाकर’ हैं कर्म करें,
हर कर्म का फल मिले नित।।

छली

छली – दंभी – पाखंडी को,
सुख – शांति नहीं मिलती,
चाहे जितना धन-वैभव रहे,
निज करनी को भरनी पड़ती,
निज करनी को भरनी पड़ती,
सदा अस्थिर रहता है छली,
कहते ‘कमलाकर’ हैं जीवनमें,
विषयमुक्त न हो पाता छली।।

कवि कमलाकर त्रिपाठी.

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