साहित्य

खुल जा स्कूल

हास्य लघुकथा

डॉ पंकजवासिनी

सुबह-सुबह माँ भगवान के सामने बैठी प्रार्थना कर रही थीं: हे भगवान! खुल जा स्कूल! खुल जा स्कूल!! जल्दी से खुल जा स्कूल!!! जैसे वो भगवान नहीं स्कूल के सामने बैठी हों! वो बड़बड़ाती जा रही थीं : इन बच्चों ने नाक में दम कर रखा है! दिन भर ऊधम मचाते फिरते हैं ! पल भर को चैन नहीं कि इनकी शैतानी से हमें फुर्सत मिले! इनकी शैतानियों के कहर से हम बच जाएंँ :मुमकिन नहीं!! इस कोरोना को कोढ़ी फूटे… लकवा मार जाए इसे… और ये उठकर पूरी दुनिया में यूँ चक्कर लगाती न फिरे…!! ताकि तनिक चैन से बैठें हम! और भरोसा पाकर सरकार ऐलान कर दे स्कूल खुलने का! स्कूल खुला रहता है तो 6 घंटे हमें चैन के नसीब तो होते हैं! पर अभी तो लगता है कि हम पहलवानी के अखाड़े में हैं या जंगे – मैदान में! या फिर हम राष्ट्रीय स्तर के शेफ बन गए हैं :दिन भर सभी के खाने की अलग-अलग डिशेज की फरमाइशें पूरी कर करके!!
पूरे भनसारी बने बैठे हैं और चोटी का पसीना सीधे एड़ी को पहुँचता है! काम करते करते हाथ भीगे ही रहते हैं… कभी सूखते ही नहीं! जैसे हाथ नहीं जल की मछली हों!! ना तो ये बच्चे स्कूल जाते हैं और ना ही बाहर मैदान में खेलने ही जाते हैं! बस दिन भर या तो झगड़ा करते हैं या टीवी देखने को लड़ते हैं या सभी अलग-अलग मोबाइल की मांँग करते हैं या तरह-तरह का होटल वाला खाना मांँगते हैं!! हे भगवान! मेरे सब्र का बांँध टूट गया!! अब तो कई कोई ऐसा मंत्र मारो कि कोरोना मर जाए!!!
फिर माँ खिड़की से बाहर यूँ ही हवा में देखती हुई बोलने लगीं :अरे ओ स्कूल! तू भी तो बैठा – बैठा बोर हो गया होगा? और कितना करेगा आराम!?! बैठा बैठा तोंदैला मोटा हो जाएगा फिर तुझसे चला भी नहीं जाएगा और तरह तरह की बीमारियों का शिकार हो जाएगा तू! फिर तेरी सारी शान चली जाएगी!! फिर किस बूते इठलाएगा तू??? जानता नहीं आराम हराम है !?! इसलिए अब तो खुल जा! खुल जा स्कूल!! तेरे पैंया पड़ूँ महाराज !!!

डॉ पंकजवासिनी
असिस्टेंट प्रोफेसर
भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय

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