साहित्य

ख्वाहिश

किरण झा

बैठी थी तन्हा सी
कुछ ख्वाहिशों ने आकर जगा दिया
अपनी रंगीनियों से
मुझे रंगा दिया
सच में
कितनी हसीन होती हैं
ये ख्वाहिशें
ना चाहते हुए भी उम्मीद के महल बनाती हैं
कितने करीने से
अपने सपने सजाती हैं
बरबस मुस्कान चेहरे पर लाती है
ना जाने
उदासी कहां गायब हो जाती है
कभी हंसाती है कभी रूलाती है
मन की फुलवारी में कितने फूल खिला जाती है
संजोए रखना “किरण”अपने ख्वाहिशों को
यही तो है …
जो खुद को खुद से मिला जाती है

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