साहित्य

कुमारी मंजू मानस की कलम से

माँ

💐माँ के गर्भ गृह में एक ,अंकुर आया था
💐उसने जीवन मे माँ का ,स्पर्श ही उसने पाया था !
💐माँ को देखा माँ को जाना ,माँ की साँसों में बस जाना
💐माँ के हर जीवन से उसने ,हर शिक्षा पाया था
💐माँ के चरणों मे दो फूल अर्पण कर, माँ को दिल मे बसाया था

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,,💐जब जन्म हुआ उसका आया बाहर, की दुनियाँ में
💐 रो रो कर उसने तो थोड़ी सा, घबराई होगी
💐माँ के हाथों का स्पर्श पाकर ,वो सकुचायी होगी!
💐प्यार के स्पर्श से ज्ञान की ,रौशनी जलायी थी
💐उसने माँ के छाती से लिपटकर कर ,खुद को सुख से भर लिया
💐ममता की आँचल में समाकर, अपने दुख दूर किया
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️💐धीरे धीरे बडी हुई माँ के साथ ,हर मोड़ हर दुख में खड़ी हुई
💐माँ के संग मिलकर उसने दुनियाँ के हर दर्द को जाना
💐माँ के दिल में रहकर ,उसने माँ को हर वक़्त पहचाना
💐अपने दुख दर्द हर गम को, माँ अपने तक रखती है
💐अपने जीवन के काँटों को ,अपने तक सहती है वो
💐हर गम हर परिस्थिति में, हर पल मुस्कुरा जाती है
💐माँ कभी नही अपना दुख, किसी को बतलाती है
💐दुख दर्द में रहकर भी ,खुशियों के सागर भरती है
💐माँ तो माँ होती है अपने कष्ट, कब सबो से कहती है
💐रोटी कोई मांगे तो, अपने हिस्से का दे देती है
💐 खुद ही खुद में भूखे रहकर भी, सबका पेट भरती है
💐कभी बेटी की दोस्त बनकर, कभी उसके संग उसकी मीत बनकर
💐 हमसफ़र की तरह हर संकट हर राँह में ,हर पल साथ निभाती है
💐माँ तो दुनियाँ की जन्नत है, हर पल मुस्कुराती है
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💐माँ है तो माँ की किम्मत जान लो तुम
💐माँ के जैसा कोई स्वर्ग नही, बस ये पहचान लो तुम
💐माँ के संस्कारो को जीवन मे अपना लेना
💐उसके संस्कार काम आयेंगे, ये तुम जान लेना
💐माँ पापा जैसा कोई कोई जग ,में भगवान नही
💐माँ बाप को जग पूजे है ,दुनियाँ ऐसा कोई धाम नही
💐माँ बाप के चरणों मे ,अपना जीवन अर्पण कर
💐माँ जैसा कोई जीवन मे, सुन्दर कोई दर्पण नही
💐माँ तेरे चरणों मे, दो फूल अर्पण करते है हम
💐तुम जँहा हो,
अपना मिठास बरसा देना
💐तेरे बालक रोते है उनको अमृत की रस पिला देना

आँसू /अश्क

ये अश्क यूँ ही नही निकलते
खुशी या गम होता ह

अश्क आँसुवो की धार
चुपचाप बहते है हर बार

माँ की सोंधी रोटी के संग
अचार सब्जी याद आता है

प्यार भरा आँचल के छाया का
प्यार याद बहुत दिलाता है

उसकी गोद की उनकी बजुवों की
ठंढक याद जब दिलाता है

सच ये अश्क हर बार बस यूँ ही
बह जाता है जब माँ की याद आता

बहुत ही इसकी कहानी होती
ये यूँ ही तन्हा तन्हा रह जाता

अश्क निकले तो दिल का दर्द
कम हो जाता

लेकिन सोच सोच के हर गम
में बस बहता जाता है

अश्क की बाते अश्क ही जाने
अश्क ही समझे अश्क पहचाने

कभी खुशी में अश्क बहते
कभी गमो में ये चुप चाप बहते

कभी प्रियतम की याद में बहते
कभी खुशी की सौगात में बहते

अश्क की कोई परिभाषा नही
इसकी कोई नही याब आशा

दिल मे दर्द होता तो अश्क
भरी महफिल में निकल जाता

लेकीन कोशिश करना दोस्त अश्क
किसी के सामने नहीं निकालना

वरना लोग मजाक उड़ाते
भरी महफिल में कष्ट पहुंचाते

जितना जी करे बन्द कमरे में
तुम अश्क बहा लेना

लेकिन सबके सामने तुम
ख़ुशियों के दीप जला लेना

यात्रा

मेरी बो सुखद यात्रा
जब तुम साथ हुवा करते थे
तेरे हाथों में मेरे हाथ हुवा करते थे
अक्सर सपनो में सोचा करते थे
आंखों में आंखे डाल अक्सर
भविष्य की बात हुवा करते थे
छोटे छोटे सपनों की सौगात हुवा करते थे
मैंने ये नही नही जाना
आखिर क्यों हमारी तुम्हारी यात्रा
एक पल में रुक गई
स्टेसशन वही था ना तुम नजर याब आते हो
वो कदम तुम्हारे चलने वाले
पल भर में क्यों रुक क्यों जाते हो
तेरा आना नहीं होता अब
ना तेरी बात होती है सखियाँ से
ना तेरे नयनों से कभी
अब मुलाक़ात नही होती मेरी
मंजिल एक थी रास्ते अलग कैसे हुये
मुझसे एक भूल हुई तुमने
दामन छोड़ दिया
पल भर में दूर होकर मेरे मंजिल के सपनो को पल भर में छोड़ दिया
आ जावो ट्रेन वही सीट वही साथ चलते है
अपने सपनो की दुनियाँ में
डाले हाथ हम चलते है
अपनीं यात्रा की सुखद कहानी लिख कर हम जायेंगे
सुन्दर सफल कामयाबी अपनी लिख जायेंगे

कुमारी मंजू मानस
शिक्षिका
छपरा सारण बिहार

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