साहित्य

कुमारी मंजू मानस की कलम से

अंधेरे में रौशनी की किरण /आस किरण

मैं मन ही मन यह सोच रही थी
जिंदगी में आशाओं की एक किरण दिखी तो थी!

मुझे मेरी जिंदगी में मेरी खुशियों और आशाओं !
को एक नई पंख मिली तो थी!

इसलिए ये दिल यह बार-बार कह रहा था छू लू नव को!
और पूरे कर कर दूं पलभर में अपने सपनो को!

अपने पंख की फिजाओं को लहरा कर, चुम लू छू लू नव को खुशियों से झूम तो लूं!

नई आशाओं की किरण को पाकर,उसकी चाहतों को मैं भी तो जान लू !

उसके सच से झूठ का पर्दाफाश कर, मैं भी उसको तो थोड़ी सी पहचान लूं!

उसका सच सबके सामने लाकर उसका सच बता कर उसके चेहरे से झूठ का नकाब हटा कर!
मैं सबको मैं दिखला दूं अपना वचन निभा तो लूँ!

लेकिन मेरे सच का पर्दाफाश करने, पर विचारों के पंख काट दिए जाते हैं!
मेरे पल-पल की खुशियों को ,कई भागों में बांट दिए जाते हैं!

मेरी आशाओं की किरण को गद्दारों के बीच कई भागों में बांट दिए, जाते हैं !

मेरे अल्फाज ने मेरी आशाओं के सपनों को, पल भर में मेरे आशाओं के सपनों को तोड़ दिए जाते हैं !

उसको नए सिरे से जीने पर मजबूर किये जाते हैं , मेरे सपनों को नए सिरे से मोड़ दिए जाते हैं!

तभी एक पल में कोई सूरज की किरण दिख जाती है ,
मेरे सपनों के विचारों को एक नई पंख मिल जाते हैं!

एक एक होकर एक होकर हम ग्यारह हो जाते हैं, ग्यारह मिलकर हम सपनों को नई दिशा दी जाते है!

उस राजा के झूठ से सच का पर्दाफाश कर सबके समक्ष रख जाते हैं, देख राजा की पराजय को हम खुश हो जाते हैं!

और राजा की पराजय की विरह वेदना देखकर मंद मंद मुस्कुराते हैं ,
आशाओं के दीप जलाकर नया जश्न बनाते हैं मनाते हैं!

पूरे राज्य में पल भर में खुशियों की लहर को दौड़ आते हैं
मेरे सपनों को एक नई पंख मिल जाती है ,

आशाओं की किरण मेरी पलभर में पूरी हो जाती है ,
जब देख जनता के बीच खुशियों की लहर दौड़ जाती है !

बर्तनों की जिंदगी

जब से बर्तनों का जिन्दगी बदलने लगा है स्वरूप।
आदमी के भी दिखने लगे है जो की कितने रूप।।

पहले मिट्टी के भोजन में मिठास हुवा करती थी।
अब तो भोजन के साथ रिस्तो में भी खटास हुवा करती है ।।

पहले भोजन को हाथों से चाट चाट कर खाते थे ।
अब तो घरों को भी लोग कई टुकड़ो में बांट कर लाते है ।।

कहते थे लोग अँगुलियों में भी खाना भगवान देते है ।
इसलिए हाथों से खाकर तृप्त का अनुभव भरा करते हैं।।

मिट्टी से पतल आया ,तांबे पीतल पीछे छोड़ कर,
जब आया स्टील।
सारी दुनियाँ चूल्हे को छोड़ कर गैस से कर रही दोस्ती ।।

हम चुपचाप देखते रह गये जब आया करोकरी से प्लास्टिक ।
भोजन ने भी स्वाद बदला जब पाया खेतो में प्लास्टिक ओर कृत्रिम जैसे खादों को ।।

लकड़ी का जगह मिल गया गैस केरोसिन जैसे इंधन।
आज हर कोई अपने आप मे रह न पाया अब कोई निर्धन।।

दिखावे में दुनियाँ चल रही रोटी सबकी जल रही ।
धनवान बैठे महलो में गरीब की थाली धूल रही।।

बेरोजगारी

हम कहलाते बेरोजगार
देखो पड़े हुये है अब तक बेकार
काम धाम की करते तलाश
लगता नही है कोई आश
सर्टिफिकेट की भरमार लगी
फिर भी नौकरी की मार लगी
जिधर देखो उधर मारा मारी है
ये नौकरी सब के लिये हुई
जैसी कोई बडी बीमारी
आई. ए. पास बी. ए. पास एम. ए. भी पास
सबकुछ है लेकिन नौकरी नही है आज बहुत के पास
टेक्निकल सर्टिफिकेट की भी है भरमार
फिर भी दोस्तो है हम आज बेरोजगार
काम का है मेरे पास बहुत अनुभव
नौकरी में उसका कोई नही उद्भव
बेरोजगार होकर आज हुये लाचार
खुद का विजनेस करने में शर्म करते महसूस
नौकरी में भी मांगे है कँही कँही कोई घुस
बेचारे बेरोजगार चुप रहते है
किसी को नौकरी मिलती है
कोई आत्महत्या कर लेते है
कोई उम्र खत्म होने पर हाथ
सिर्फ मल कर रह जाते है
बच्चों के सामने मजबूर होते है
बीबी से धीरे धीरे दिल से दूर होते है
जिंदगी के इस खेल में जाने
कब कैसे मजबूर होकर
जिंदगी के अरमानों से खुद को दूर होते
ये बेरोजगारी के गाड़ी मुझको लगती बड़ी बीमारी !!

कुमारी मंजू मानस
बिहार शिक्षिका
छपरा सारण

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