साहित्य

लफ्जों का कारवां

मधु अरोड़ा
अफसोस
अफसोस चलती रही जिंदगी,
मुझे जीने का ढंग नहीं आया।
अफसोस है मुझे हर उस पल का,
बेहतर हो सकता था मुझे बनाना नहीं आया।
अफसोस है हर अधूरे ख्वाब का,
जो आंखों में बसे हैं मेरी,
मुझे रंग भरना नहीं आया।
अफसोस है मेरे लफ्जो से,
ठेस पहुंची हो किसी को,
माफी मांग लूं उनसे
क्षमा करा दूं मैं खुद को ।
ख्वाबों का दौर है ,
सपने कहां पूरे हुए हैं किसी के,
आंखों में बसे हैं वह सारे,
अफसोस क्या करें?
वक्त है आओ,
उनको मिलकर पूरा करें।
हिम्मत हौसलों की उड़ान से,
व्यथा अपनी दूर करें ,
आओ जीवन में कुछ सुनहरे रंग भरें।।

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