साहित्य

महाभारत के मेरे मुरलीघर

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ” सहज़”

तुम्हारा प्यार और दुआ ।
पापा आगे जो बढ़ी हूं मैं ।
तुम्हारे सुख , दुख , में ।
हर वक्त साथ खड़ी हूं मैं ।
में अरमान हूँ पापा का ।
ममता हूं मेरी मम्मी की ।
गुड़िया हूँ अपने भैया की ।
बहनों की परी हूँ मैं ।
आखें जो देखें मेरी ।
पल मे ही समझ जाते हैं ।
पापा और मम्मी की ।
मुहब्बत की कहानी हूँ मैं ।
नन्ही सी मैं चिड़िया।
मैरे परों को न कतरो तुम ।
मां कभी दुर्गा कभी बहना ।
और बेटी हूं मैं ।
इज्ज़त बचा लेना ।
महाभारत के मेरे मुरलीधर ।
इंसानियत के डर से ।
चुपचाप खड़ी हूँ में ।
मुश्ताक ये कैसा ।
उपकार है मुझपर ।
जिंदा जली और कभी ।
गर्भ में ही मरी हूँ में ।
डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ” सहज़”

हरदा

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