साहित्य

महेन्द्र सिंह राज की कलम से

गुरु पूर्णिमा

गुरु चरणों की वन्दना, करता बारम्बार।
गुरु से ही ज्ञान मिलता, गुरू ज्ञान आगार।।

गुरु की महिमा गा रहे, सारे वेद पुरान।
गुरू रूप भगवान का,गुरू गुणों की खान।।

गुरु सेवा जिसने किया, पाया इच्छित ज्ञान।
शिष्यों का कर्तव्य है, गुरु का रखना मान।।

गुरु की आज्ञा पालना, शिष्यों का है धर्म।
जिसको अंगीकार है , वही समझता मर्म।।

ऐसे गुरू न चाहिए , ले अगुठे का दान।
शिक्षा तो कुछ दे नहीं, फिर भी पाए मान।।

कपटी गुरुओं से रहो, सदा सभी होश्यार।
अनवांछित गर मांग हो,तुरत करो प्रतिकार।।

संत असंतहि भेद को, समझो सारे लोग।
संतहि सद्गुण पालता, असंत चाहे भोग।।

गुरु दर्जा भगवान सम, गुरु का राखो मान।
गुरू वृहस्पति हैं गुरू, करें देव सम्मान।।

गुरुमुख होते क्यों सभी,बिनसमझे सब लोग।
गुरुमुख होने के लिए, गुरु चहिए बिन रोग।।

सत्गुरु यदि मिल जाँयतो, गुरू बनाओ आप।
बद्गुरु तो होते सदा, धरा हेतु अभिशाप।।

साधू मुल्ला पादरी, धर सज्जन का भेष।
कपट छद्म मन में लिए, रखें कामना शेष।।

मन के भावों को लिखा, पढ़कर करो विचार।
खुद सोचो अच्छा लगे, तभी करो स्वीकार।।

आओ प्रीतम मेरे नैना

आओ प्रीतम मेरे नैना,
तेरा सुपथ निहारें….
कभी कभी अन्दर में झाकें
कभी देखते द्वारे…..
आओ प्रीतम मेरे नैना
तेरा सुपथ निहारें…..

फागुन बीता सावन आया,
सजना गेह न आए….
अब पड़ती बरसा की फुहार,
छाए घन कजरारे….
आओ प्रीतम मेरे नैना
तेरा सुपथ निहारें…….

जब पानी टप टप रव बरसे
प्रेम के डोरे डारे…..
आओ सजना मेरे तन की
अब तो प्यास बुझा रे…
आओ प्रीतम मेरे नैना
तेरा सुपथ निहारें……

मैं पागल तेरे वियोग में
दिन में दिखते तारे….
मन्मथ मुझको बहुत सताए
दिल के हाथों हारे….
आओ प्रीतम मेरे नैना
तेरा सुपथ निहारें……

लोक लाज वश कुछ ना बोली
बन्द हुए मग सारे……
तेरा विरह सताए मुझको
तुम जीते हम हारे…….
आओ प्रीतम मेरे नैना
तेरा सुपथ निहारें…तेरा सुपथ निहारें…

सावन गीत (कजरी)

झूला पडा़ कदम की छैयाँ
झूले कृष्ण कन्हैया ना….

मधुवन मेंसब सखियां आई
एक दूजे को गले लगाई
आपस में सब करें ठिठोली
एक दूजे को बोलें बोली
संग में बंशी बजैया ना…..
झूले कृष्ण कन्हैया ना……

झूला पडा़ कदम की छैयाँ
झूले कृष्ण कन्हैया ना…..

सुन्दर सावन मास सुहाये
पक्षी कलरव मन को भाये
बागों में कोयल है गाती
जोजन जनके मनको भाती
आनन्दित रास रचैया ना……
झूले कृष्ण कन्हैया ना…….

झूला पडा़ कदम की छैया़ँ
झूले कृष्ण कन्हैया ना…..

हंससुता की सुन्दर कगरी
नभ में छाई है बदरी
घुमड़ घुमड़ घन करते शोर
कुंजन नाच रहे हैं मोर
सुमधुर गीत गवैया ना…..
झूले कृष्ण कन्हैया ना…..

झूला पडा़ कदम की छैयाँ
झूले कृष्ण कन्हैया ना…..

झूला झूल रही है राधा
संग में राधा के हैं काँधा
ग्वालन ग्वाल बाल हैं संग में
दामिनिकौंध रही अँगअँग में
पास में सोकनी गैया ना…
झूले कृष्ण कन्हैया ना…

झूला पडा़ कदम की छैयाँ
झूले कृष्ण कन्हैया ना… ..

महेन्द्र सिंह राज
मैढी़ चन्दौली उ. प्र.

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