साहित्य

महेन्द्र सिंह राज की कलम से

सावन गीत (कजरी 2)

झूला झूल रही सावन में
सुन मेरे सजना आओ ना

जेठ माह में गरमी लागे
तर तर तर बहे पसीना
आसमान से आतप बरसे
मुश्किल है सबका जीना
बम्बू बेना हाथ में लेकर
धीरे धिरे डुलाओ ना……
सुन मेरे सजना आओ ना….

झूला झूल रही सावन में
सुन मेरे सजना आओ ना…

जब से आया माह अषाढ़
रिम झिम बरसे पानी
धरती माँ की प्यास बुझे
अरु ओढे़ चुनरिया धानी
तन मन मेरा शीतल होता
प्रेम के गीत सुनाओ ना…..
सुन मेरे सजना आओ ना….

झूला झूल रही सावन में
सुन मेरे सजना आओ ना…

सब सखियों के सजना तो
छुट्टी ले ले घर को आये
मैं ही एक अभागन ठहरी
क्यों तुमको समझ न आये
पलक पाँवडे़ राह बिछाई
अब और नहीं तड़पाओ ना…
सुन मेरे सजना आओ ना…

झूला झूल रही सावन में…
सुन मेरे सजना आओ ना..

मेरे सजना घर को आये
प्रेम के नेह लगाऊंगी
झूलूँगी सावन के झूले
मैं भी कजरी गाऊँगी
विरह आगमें तनमन जलता
प्रेम सुधा बरसाओ ना…..
सुन मेरे सजना आओ ना…..

झूला झूल रही सावन में….
सुन मेरे सजना आओ ना…

मान सखे

इस दुनियाँ में जनम लिया तो
समझो जीवन सार सखे।
जीवन मतलब भूल न जाना
कभी न जाना हार सखे।।

मात पिता ने जन्म दिया है
भूलो न उपकार सखे।
जिस गुरुवर ने ज्ञान दिया है
राखो चित्त उदार सखे।।

अग्नि वायु जल मुफ्त मिला है
भू नभ से उपहार सखे।
अन्न धरा देती खाने को
करती मां सम प्यार सखे।।

जीव जीव सब मां के प्यारे
ना लो उनकी जान सखे।
अल्प स्वाद के खातिर अपने
भूले निज पहचान सखे।।

मानव सबसे बुद्धिमान पर
आज बना हैवान सखे।।
इतनी भीषण विपदा आई
फिर भी खडे़ न कान सखे।।

सीधे साधे कहते खुद को
बनते जो नादान सखे।
उनकी करनी ध्यान से देखो
वही बडे़ बेइमान सखे।।

सबका मालिक एक प्रभू है
रखता सबका ख्याल सखे।
दीन दुखी को नहीं सताओ
तकरारों को टाल सखे।।

मानव बन सद धर्म निभाओ
बढ़े तुम्हारी शान सखे।
सोच विचार “राज” कहता है
मेरा कहना मान सखे।।

चंचल नयन

राधा के चंचल नयन , करे श्याम को तंग।
सुन मुरली की तान को,फड़के राधा अंग।।

कजरारे चंचल नयन , मारे चितवन तीर।
देख नयन के सैन को,बढ़ती मन की पीर।।

नटखट मन है कीस सा , नहीं मानता बात।
मिलकर गो के साथ में,दिल पर करता घात।।

चंचल मन उमगत नदी , नहीं नियंत्रित धार।
गो गोचर पर विचरती , करतीं दिल को तार।।

चंचल चितवन देख के, मन भरता इक आह।
मन विचलित ना हो कभी,चलो सत्य की राह।।

बडे़ नशीले नयन ये, देते मन को फेर।
अस्थिर जन गिरते सदा, लगे न किंचित देर।।

नयन तीर के वार से, घायल होते लोग।
अपनी करनी फल सदा, पाते हैं हर लोग।।

लज्जा बसती नेत्र में, सदाचार का मूल।
इस लज्जा को त्यागना, होगी भारी भूल।।

नारी का गहना सदा , होती लज्जा एक।
गर नारी त्यागे इसे, मुश्किल बने अनेक।।

नयन हीन प्राणी नहीं, देख सके संसार।
करें भरोसा राम पर , होगा बेडा़ पार।।

दुनियाँ चलती लीक पर, लीक बनाए राम।
नयनों में हो राम छवि, बन जाये हर काम।।

गरीबी कर्म बनाम भाग्य

हाय गरीबी पाँवडे़, अपनी रही पसार।
निर्धन जनता झेलती,सदा भूख की मार।।

भूखे रहने से सदा, अच्छा जूठा भात।
ये है किस्मत की सदा, मानवता पर घात।।

दुख होता है देखकर,यह किस्मत का खेल।
फिर भी कहते लोग हैं, आपस रखिए मेल।।

एक तरफ धनवान जन,खायें छप्पन भोग।
निर्धन को जूठा मिले, बहुत दुखद संयोग।।

भाग्य कर्म का खेल है, होना धनी गरीब।
इसको माने हैं सभी, धर्म करीब करीब।।

देखें दशा गरीब की, होता मन संताप।
हर प्राणी भोगे यहां, अपनी करनी आप।।

यह समाज असमान है,निर्धन जन लाचार।
मानवता रोती यहाँ, बैठ विवश के द्वार।

वो समाज के लोभियों, कुछ तो करिये शर्म।
भूखों को भोजन मिले, ऐसा करिये कर्म।।

एक निर्धन महिला जहां, हो इतनी मजबूर।
काम करे जूठन मिले, नहीं नाश अति दूर।।

इस समाज को चाहिए,रखे सभी का ध्यान।
ऊंच नीच छोटे बड़े, सब हों एक समान।।

कोई भी महिला दुखी, नहीं रहे संसार।
कब आएंगे श्री प्रभू, चलकर शबरी द्वार।।

जैसा कर्म किया मिला, झुग्गी या आगार।
कर्म फलहिं मिलता सदा,यह गीता का सार।।

जेठ का आतप

है जेठ का महीना
तर तर बहे पसीना
आकुल धरा तपन से
मुश्किल हुआ है जीना।

पक्षी हैं सारे प्यासे
जीने की खत्म आसें
पशुओं काहाल खस्ता
सूखी हैं सारी घासें।

सूखी नदी व झरना
पानी कहां से भरना
सूखा है ताल पोखर
निश्चित सभीका मरना।

अब बन्द होती सांसें
चेहरे हुए रुआंसे
झुलसा गयेहैं तरु भी
उलटे पडे़ हैं पासे।

अरु बढ़ रही है गरमी
मौसम हुआ बेशरमी
पवन नहीं है चलती
बेतहासा सारे करमी।

रब को दया न आती
प्रकृति बनी संहाती
यम काभी चक्र डोले
प्रलय के गीत गाती।

हे प्रभो तुम हो दाता
इतना समझ में आता
करनी है जैसी नर की
वैसा ही फल वो पाता।

न माफ करते गलती
ये बात हमको खलती
अच्छे बुरे जगत में
दुनियां है, ऐसे चलती।

भानू का कोप कम कर
बस इतना ही करम कर
ये सारा जहां है तेरा
दुनियाँ पे तूँ रहम कर।
दुनियाँ पे तूँ रहम कर।।.

गुरू/विश्वगुरू

गुरु चरणों का वंदन करके,
गुरु की महिमा गाते हैं।
उनके चरणों में हम प्रतिदिन,
अपना शीश झुकाते हैं।
गुरू वही है जो शिष्यों को,
पावन पथ दिखलाता है।
अपनी अर्जित सकल ज्ञान निधि,
शिष्यों को सिखलाता है।।

गुरु की महिमा का वर्णन तो,
सब पुराण भी गाए हैं।
अपनी प्यारी वैदिक संस्कृति,
सारे जन अपनाए हैं।
भारत पहले विश्व गुरू था,
फिर उपाधि यह पाना है
अपने श्रम के बलबूते पर,
आगे इसे बढ़ाना है।।

महेन्द्र सिंह राज
मैढी़ चन्दौली उ. प्र.

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