साहित्य

महेन्द्र सिंह राज की कलम से

तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये

फागुन के मस्त बहारों में
फगुआ के रंग फुहारों में,
होली जलते अंगारों में
या नील- गगन के तारों में
मैं तुम्हें ढूँढता हूँ पल पल
तुम कब रहती हो कता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

खेतों के फूली सरसो में
जो बीत गये उन बरसों में
कल आने वाले अरसों में
या आओगी कल परसों में
मैं तुम्हें ढूँढता हूँ पल पल
बतला दो मेरी खता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

भादों की काली रातों में
इक दूजे के जज्बातों में
आपस के रिश्ते नातों में
या बेला सुन्दर पातों में
मैं तुम्हें ढूँढता हूँ पल पल
मेरी गलती तो जता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

पूनम के उजले चन्दा में
न फँसी किसी के फन्दा में
या पहुँची अलका नन्दा में
क्यौं सोई गहरी तन्द्रा में
मैं तुम्हें ढूँढता हूँ पल पल
शायद बन गइ तूँ लता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

वासव के शुभ नन्दन वन में
इस जगती के हर कन कन में
काल चक्रके प्रति क्षण क्षणमें
तुम बसती थी मेरे मन में
मैं तुम्हें ढूँढता हूँ पल – पल
रहती थी मुझमें रता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

रावण की नगरी लंका में
रहता मैं निशि दिन शंका में
या ग्रसित हो राहू बंका में
या फँसी किसी के अंका में
मैं तुम्हें ढूँढता हूं पल -पल
अब तो ना मुझको सता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

तुम छिपी प्रसूनों कलियों में
या वृन्दा वन की गलियों में
या काँधा के संग छलियों में
या राधा की रंग रलियों में
मैं तुम्हें ढूंढता हूँ पल -पल
तूँ देती मुझको धता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

अम्बर के चाँद सितारों में
या वाद्य यंत्र के तारों में
मेरी कविता झंकारों में
या मेरे अपने यारों में
मैं तुम्हें ढूँढता हूँ पल पल
तूँ बता मुझे निज पता प्रिये।
तुम कहाँ छिपी हो बता प्रिये।।

प्यासी धरा

घनघोर घटा मड़राई
अम्बर में बादल छाए,
करते हैं आँखमिचौनी
जब इधर उधर को धाएं।

बादल की आँख मिचौनी
अब देख धरा हरषाए,
वारिद मिलने को आतुर
बन अम्बु नीर बरषाएं।

भीगे अवनी का कण कण
सद्य स्नात द्युति बाला सी,
जग में छायी हरियाली
हरित मेखला माला सी।

जल कण तरु के पातों पर
मोती सा शोभा पाते,
बारिश रुकते ही नभ में
खग पक्षी दल मड़राते।

धरती का कोना -कोना
हरियाली से सज जाता,
पुलकित हो बादल नभ से
अवनी की प्यास बुझाता।

एक बरस प्यासी धरती
देखे अम्बर प्रियतम को,
व्यथा न सह पाए जब नभ
जल बरसा हरता तम को।।

धरती की प्यास बुझाकर
फिर नीर सिन्धु को धाता,
रवि किरणों से वाष्पित हो
घन बन अम्बर में छाता।

नीरद नभ नीर धरा का
चलता यह काम अविराम,
यदि नभ घन वायु सिंधु है
तो सिन्धु सरिता जल धाम।

महेन्द्र सिंह राज
मैढी़ चन्दौली उ. प्र.

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