साहित्य

मैं सदा चलती रही


साधना कृष्ण
……………
आज फिर से वेदना इक
पीर मुझको दे गयी।
आँसूओं से सींच सींच
अधीर मुझे कर गयी।

हुई कभी जो आकुल मैं
व्यथित विकल उर रहा।
व्याकुल हृदय भाव ले
पाखी बना फिर रहा।

मारकर हर ख्वाहिश को
पथिक बन चलती रही।
राह तो दुष्कर बहुत थे
. किंतु मैं बढ़ती रही।

हर कदम बाधायें खड़ी
चलना हुआ दुश्वार।
हौसला भी कह रहा था
चल राही निर्विकार।

करके जतन कोटिशः सदा
संधान करती चली।
सजग होकर रखती कदम
मंजिल पा सकी भली।

विश्वास का था साथ जो
अंगुली पकड़ी रही।
उदासियों के आँगन में
उम्मीद बोती रही।
साधना कृष्ण
लालगंज ,वैशाली ,बिहार

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!