साहित्य

मानवता

-लघु कथा

शिल्पी सिंह राजावत

(दरवाज़े पर दस्तक हुई) माँ बोली ” जाओ सीमा दरवाजे पर कोई आया है देखो ज़रा कौन है ? सीमा विद्यालय से मिला गृहकार्य कर रही थी, माँ की एक आवाज़ से वह उठ कर दरवाजा खोलने गयी, उसने देखा एक वृद्धा आँख से झलकते आंसू, पैरों में चप्पल भी नहीं, हाथ जोड़, कराहती हुए स्वर में बोली ” बेटा ! मैं अभागन रहने के लिए घर नहीं, भूख से व्याकुल, कुछ खाने के लिए दे दो ! सीमा वृद्धा को देख सहम गयी, मर्म शब्दों में बोली ” आप मेरी दादी जी के समान हैं, कृप्या हाथ न जोड़िये और अभी मैं आपके लिए भोजन का प्रबंध करती हूँ ! वह रसोईघर की ओर दौड़ी और कुछ खान पान की वस्तु खोजने लगी, वह रोटी दाल चावल एक थाली में परोस कर ले जाने लगी, तभी माँ ने आवाज़ दी और कहा ” यह तो रोज़ के भीख मांगने वाले भिखारी हैं, इनका यही काम है घर घर जाकर ढोंग करना और भीख मांगकर गुज़ारा करना ! तुम जाकर अपनी पढ़ाई करो, मैं भगाती हूँ अभी इस मैली कुचैली दुर्गन्धित वृद्धा को ! सीमा ने माँ, की बात को अनसुना किया और आगे बढ़ी,(तभी कड़े स्वर में) ” मैंने कहा न अंदर जाओ, पढ़ाई करो ! सीमा अभी महज़ 11 वर्ष की है वह डर गयी और भोजन की थाली रख कर, कमरे में चली गयी! माँ बाहर गयी और वृद्धा पर ज़ोर से चिल्लाकर कहा ” यहां से जा, भगवान ने हाथ पैर दिए हैं कुछ काम करके जीवन यापन कर यहां कुछ नहीं मिलेगा ! और भी बुरा भला कहकर उसने वृद्घा को वहा से फटकार लगा भगा दिया ! सीमा की माँ यह काम कर, अपने किये पर इतरा रही थी ! लेकिन वह इस बात से अनजान है, जो उसके द्वार आया था वह भविष्य है आपका, वह एक छवि है आपके आने वाले कल की !
(समय बीता, कुछ वर्षों बाद)
सीमा का विवाह हो गया, वह अपनी घर गृहस्थी में व्यस्त हो गयी लेकिन आज भी उसके मन में उस वृद्धा की छवि थी! आज फिर वह इसी ख़्याल में थी, तभी दरवाजे पर घंटी की आवाज़ आयी, उसकी बेटी स्मृति बहुत चंचल थी, वह दौड़ कर दरवाजा खोलने गयी उसने देखा एक वृद्धा जो रोते हुए भूख से बिलख रही थी और रुदन स्वर में खाना मांग रही थी, स्मृति ने आवाज़ दी ” माँ, इन्हें भूख लगी है मैं कुछ खाने के लिए दे दूँ ? सीमा को वही पल याद आये उसने कहा ” बेटा! वृद्धा को अंदर बुला लो, अच्छे से बिठाओ और मैं अभी भोजन परोस कर लाती हूँ !
स्मृति ने भोजन दिया, वृद्धा को भोजन कर वह जाने लगी तभी सीमा आयी, वह वृद्धा को देख एक टक रह गयी, मानो पैरों तले जमीन ही खिसक गयी ! क्योंकि यह वृद्घा उसकी ही माँ थी!
वह ख़ामोश हो गयी, कुछ न बोल सकी !
यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है, कहने को यह मात्र एक छोटी सी घटना है, परन्तु मैं इसके माध्यम से आप सभी को बहुत सी बातें बताना चाहती हूँ ! हम यह क्यों भूल जाते है, जैसा हम करते हैं वही भरते भी हैं, एक न एक दिन आपके साथ भी वही होगा जो आप दूसरों के साथ करते हैं ! दूसरी बात, माता पिता एवं परिजनों के लिए है समाज हमसे ही बना है यदि हम परिवार में अपने बच्चों को अच्छी सीख नहीं देंगे उन्हें सही ग़लत नहीं बताएंगे तो उन्हें एक अच्छा मानव कैसे बनाएंगे ! माता पिता ही बच्चों के पहले गुरु या शिक्षक होते हैं! तीसरी बात यह है की आज हम ऐसे समय हैं जहां हमें अपने कर्मों का फल जीवनकाल के चलते ही मिलेगा ! एक अंतिम बात, हम किसी की मदद नहीं कर सकते तो हमें उन्हें चोट पहुंचाने का भी कोई अधिकार नहीं!
मानवता बरक़रार रखें और मानवता का भी पाठ होना चाहिए जैसे, नृत्य, गायन, फैशन, और अनादि की क्लासेज हम अपने बच्चों को दिलाते हैं ठीक उसी प्रकार हमें स्वम ही अपने बच्चों को मानवता का पाठ पढ़ाना चाहिए! मैं यह परिवार से दरख्वास्त कर रही चूँकि समाज परिवार से बना है, यदि परिवार का प्रत्येक सदस्य मानव बन जाये तो एक मानव समाज का उदय होगा
धन्यवाद,
शिल्पी सिंह राजावत
नई दिल्ली भारत
इंस्टा id- rajawat_shilpi_singh

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