साहित्य

मेरा हृदय उद्गार

!!कान्हा जब टेढ़े हो करके !!

गिरिराज पांडे

कान्हा जब टेढ़े हो करके बंसी ओठ लगाते हो
भाव मेरा तो जागृत होता मुझ में तुम बस जाते हो
इच्छा जागृत होती मुझ में बार बार तुझे पाने को
पास रहो तुम सदा हमारे कहना मत अब जाने को
याद सदा ही मुझको आओ कहना मत भूल जाने को
तेरे बिन अब रह ना सकूंगा कुछ बचा नहीं समझाने को
देख देख कर मन करता है पास ही मेरे रहते तो
संकट सारा छठ जाता जब मुझसे बातें करते तो
तेरी हर एक बात मुझे तो हरदम अच्छी लगती है
प्रेम भरी तेरी बातें जीवन को प्रेरित करती है
तेरा सुंदर रूप हमेशा मन को मोहित करता है
देखू हर दम ही तुझको मै दिल ये मेरा कहता है

गिरिराज पांडे
वीर मऊ
प्रतापगढ

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