साहित्य

मेरा वतन

ना माईकेल सिंह

जिस वतन से मिली मुझे मेरी पहचान मेरी मर्यादा,
लहू पेश करूँ नज़राने में तब भी यह कम है।

यह वह वतन है जिस के कण कण में शहीदों की कुर्बानी हर दम है,
अंतर्द्वंद से टूटे जितनी भी कड़िया आज भी इसमें दम खम है।

वतन के वास्ते जो भी भेंट करूँ नज़राना,
सर्वस्व करूँ न्यौछावर मातृभूमि के लिए वह भी कम है।

हे माँ अपने सुपुत्रों का नज़राना स्वीकार करना,
वतन के नाम पर सर कलम कर दूं तो भी कम है।

मीना माईकेल सिंह
कोलकाता

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