साहित्य

मेरे मन के आंगन में..

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मेरे मन के आंगन में कभी फूलों सी खिलती हो तुम,
कभी मासुमियत से मेरे लबों पर मुस्कराती हो ऐ जिंदगी!

मेरे रग-रग में कभी उन्मुक्त झरने सी झरती हो तुम,
कभी दामिनी बनकर आंखों में चमकती हो ऐ जिंदगी!

हसीन दिलकश हो तुम मेरे लिए महबूब की तरह,
कभी ख्वाब सी बनती कभी बिगड़ती हो ऐ जिंदगी!

कभी मधुर संगीत बन जाती हो मेरे जीवन का तुम,
कभी अपनी खामोशी से सन्नाटा बन जाती हो ऐ जिंदगी!
उषा शर्मा त्रिपाठी

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