साहित्य

“मेरे असबाब को अपनी आगोश में भरने वाली ए अर्धांगनी सुनों ना”

भावना ठाकर

अनैसना जँचता नहीं तुम्हारे माहताब पर..
वह तुम ही तो हो जो मेरी रचनाओं पर राज करते विराजमान है,
करीब आओ, छुओ पन्नों पर मुस्कुराती अपनी आत्मा को, पढ़ो मेरी हर कविता में खुद को
तुम्हारे पसीजते तन की खुशबू से सराबोर कर दो मेरी रचनाओं को
हर पंक्ति में शुमार है तुम्हारी अदाओं का….

नहीं ओर कोई नहीं मेरी रचनाओं की नायिका,
मेरी कल्पनाओं की अंगड़ाई हो तुम, तुम्हारे जुड़े से गिरती मोगरे के गजरे की महक से बने है मिसरे मेरी गज़ल के..

वह…हाँ…वह

जो नशीली आँखों को जाम लिखा है वह तुम्हारे नैंनों का कम्माल लिखा है
“शक ना करो”
तुम्हारी कमर में कस कर बंधे पल्लू को मैंने अपनी मंज़िल लिखा है..

तुम्हें सोचना तुम्हें लिखना तुम्हारे प्रति अहोभाव और तुम्हारा ऋण चुकाना नहीं
ये इन्तेहा है मेरे इश्क की..
मेरे संसार रथ की धुरी किस तरह तुम्हारा शुक्रिया अदा करूँ
संजोया है मेरे जीवन को तुमने बखूबी
अनुचर हूँ तुम्हारा…

तुम्हारी नाभि को चक्रवात लिखा है
पर्वत की चोटी नहीं तुम्हारे वक्ष की कलात्मक अभिव्यक्ति लिखी है…
धड़कन की घकघक नहीं
तुम्हें मेरे जीने की वजह लिखा है…

अरे रूठो नहीं वो तुम्हारे लबों की तबस्सुम को ही मैंने झिलमिलाता गौहर लिखा है
देखो ना दसवें पन्नें पर जो मुकम्मल मेरा जहाँ लिखा है
वह मेरे आशियाने की गरिमा तुम्हारे समर्पण का सार लिखा है..

कह न पाया कभी अपने अहसास तुम्हें रुबरु
तुम्हारे प्रति संमोहन के मोतियों को
शब्दों में पिरोया है
स्पर्श करो पसीज उठोगी मेरी चाहत की तपिश में नहाते..
ये रचनाओं का महज़ सरमाया नहीं
मेरी पूजा है जो कि है मैंने ताउम्र तुम्हारी..
ओ मेरे तसव्वुर की सुरबाला कसम से मैंने अपनी कला तुम्हारे नाम लिखी है।

अनैसना (रूठना)
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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