साहित्य

मुझे छोड़ दो मेरी तन्हाइयों में

किरण झा

रहना ही नहीं मुझे अब तेरे लफ़्ज़ों में
मुझे छोड़ दो मेरी तन्हाइयों में

नहीं रहना तेरे गीतों में
ग़ज़लों और नगमों में
कब तक भटकती रहूं
तेरी रूबाइयों में
मुझे छोड़ दो मेरी तन्हाइयों में

अब तेरी बेरुखी समझ आती है
तुमसे मेरी दूरी समझ आती है
खटकने लगी तुम्हें तेरे एहसासों में
मुझे छोड़ दो मेरी तन्हाइयों में

ना जाने ये कैसा नाता है
छूट कर भी छूट नहीं पाता है
ठहरे रहते “किरण” के ख्यालों में
मुझे छोड़ दो मेरी तन्हाइयों में

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