साहित्य

नई रीत

कमलेश मुद्ग्ल

निशा और इरा दो बहनें हैं। दोनों ही अपने माँ और पिताजी से बहुत लगाव रखतीं हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। अपने अपने घर में दोनों सुखी हैं। हर बार की तरह कुछ दिनों के बाद करवा चौथ का व्रत आने वाला है। निशा कुछ दिन से थोड़ी परेशा न सी दिख रही है। ये बात उनकी सास ने महसूस की तो निशा से पूछ लिया क्या बात है निशा, घर में सब ठीक हैं कोई परेशानी तो नहीं। निशा ने पहले तो कहा अरे, माँ जी सब ठीक है आप परेशान न हो। कैसे ना हूँ परेशान त्यौहार आ रहा है और तुम चुप चुप हो। घर की बहु अगर खुश ना दिखे तो मुझे अच्छा नहीँ लगता। आज उन्होंने शब्दों पर जोर देकर कहा। निशा अपनी सास की बहुत इज्ज़त करती है और अपनी बातें भी उनसे साँझा कर लेती है। तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाती हूँ , तुम्हारे सिर में दर्द हो रहा होगा। ये कहकर वो रसोई घर की और चल देती हैं। निशा के मन में विचारों का तूफान आ रहा है बोलू या नहीं, कहीं नाराज़ हो गई तब ? चाय लेकर सासु माँ आ गई । अब बताओ क्या बात है ? पवन से कुछ बात हुई है क्या ? नहीं माँ जी। माँ जी आपको मालूम है कि मेरा कोई भाई नहीं है । ये आज क्यों बता रही हो। हमारे परिवार ने कुछ कहा ? नहीं माँ जी। फिर ? मेरी भाभी भी नहीं जो मेरी माँ को बायना निकाल कर दे। मेरी माँ को इस त्यौहार पर कुछ कमी लगती होगी ना ? मैं समझी नहीं निशा साफ़ साफ़ कहो माँ जी मेरी माँ आपकी सम धि न लगी। हाँ । क्या जब मेरी माँ त्यौहार देने आये तो मैं उन्हें सुहाग की चीजें दे सकती हूँ। निशा बिना रुके बोल गई। बस इतनी सी बात निशा अरे तुम्हारी माँ को मैंने सदा अपनी सहेली माना है। तुम अभी जाओ और जो तुम् मेरे लिए लाओगी उस से ज्यादा अपनी माँ के लिए लाना। पगली प्यार से बोली निशा की सास। आज ये दोनो मिलकर एक नई रीत का आरंभ करने जा रही हैं,

कमलेश मुद्ग्ल ( दिल्ली)

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