साहित्य

नम्रता श्रीवास्तव की कलम से

सादगी है कुदरती खूबसूरती

सादगी की क्या बताऊं आज मैं बात,
इसके बिना कुछ नहीं जीवन के साथ,
सूरत नहीं सीरत को देखो ऐ हमदम,
मलाल ना रहेगा फिर, न बिगड़े हालात।

सुंदरता तो क्षणिक है पल भर का गुमान,
इस पर ना कर बंदे तू बिल्कुल अभिमान,
मन की खूबसूरती को जो तू समझ जाएगा,
जीवन जीना होगा फिर और भी आसान।

कुदरत को तुम देखो सादगी का पहने जामा,
चमक-दमक से दूर ना कोई हंगामा,
धैर्य रखा अगर तो मुसीबत भी टल जाएगी,
अधीरता नहीं पाती कभी जग में ठिकाना।

दिल की स्लेट पर मैंने इश्क का लिखा नाम,
सीरत मेरी देखकर करना ऐतबार हमदम,
गुलाब नहीं जो महककर ही रह जाएंगे,
कीचड़ में खिले कमल जैसा होगा मेरा काम।

यारा मेरा तो जग में सबसे न्यारा है,
मेरे सूने दिल का वह हमदम प्यारा है,
सूरत पर कभी हमने गौर नहीं किया,
सादगी पर प्रियतम की मैंने दिल हारा है।

सावन

आया सावन छाई हरियाली,
पुष्प- गुच्छ आए डाली -डाली।
मन मयूरा मेरा नाच उठा,
प्यारी कोयल कूके मतवाली।।

सावन की वो पहली बूंदें,
एहसास प्रणय का करती चूमें।
मीठी-मीठी मुलाकात याद आए,
खयालों में मीठे सपने बुनें।।

जज्बातों का सैलाब है बहता,
बरसात का जब मंजर रहता।
पतझड़ ने बांधा अपना फेरा,
प्रकृति में मौसम सुहावना रहता।।

बरस गया बरसा का पानी,
चमक रही हैं बिजली रानी।
दादुर ,मोर, पपीहा बोले,
टप- टप खेत खलिहान बरसे पानी।।

कृष्ण संग राधा की लीला न्यारी,
चंद्रमौलि की फिर सजती सवारी।
शिवालयों में बम भोले का घोष,
अंतर्मन की खुशियां जाए ना संवारी।।

आदत सुधार लो

सत्पथ पर चल बंदे,
आदत अपनी सुधार लो।
निंदा से बच तू बंदे,
सन्मार्ग तुम अपना लो।।

अच्छाई का पथ है सुहाना,
इसे कभी ना तुम घबराना।
राह में आएं कई बाधाएं,
पर तुम हिम्मत ना हारना।।

प्रात: उठकर नित्य कर्म कर लो,
योगा करके ईश- नमन कर लो।
माता-पिता का बंदन करके,
आदत अपनी सुधार लो।।

ईश्वर का वरदान है यह जीवन,
परोपकार में करो जीवन अर्पण।
होगा जो करम कृपा निधान का,
माया जाल से होगा तुम्हारा तर्पण।।

कर्म की गठरी संवार प्यारे,
धन दौलत सब उपकार में वारे।
करेंगे जो श्रेष्ठ कर्म हम सब,
अच्छी आदतों के रहेंगे सदा सहारे।।

एक पीली शाम

ढलती सूरज के बाद आई,
एक पीली शाम,
कितने सपने, कितने वादे
लाई पीली शाम।
मन के किसी कोने में,
एक पुरानी स्मृति आई,
कुछ खट्टी- मीठी यादें,
कुछ याद पिया की आई।
एक दिन और बीत गया,
आया ना कोई पैगाम,
अब क्या आस लगाऊं,
ए पीली पीली शाम।
सहसा हुई दस्तक दरवाजे पर,
मन ही मन मैं मुस्काई,
लगता है मिलन की चाह,
प्रीतम को है खींच लाई।
धड़कन हो गई तेज,
कुछ सवालों ने घेरा,
क्या होगा पहला शब्द,
जब आएगा दिलबर मेरा।
तुम्हारा आना पीली शाम,
लेकर एक आशा की किरण,
कली दिल की खिल जाए,
हो जाए मदमस्त आलम।

रचना✍️
नम्रता श्रीवास्तव

(प्र०अ०)
प्रा०वि० बड़ेहा स्योंढा
क्षेत्र-महुआ, जिला-बांदा

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