साहित्य

नीलम राकेश की कलम से

एहसास

चाहत है
मिलन की
रात होने दीजिए।

सूख रहा
है पनघट
बरसात होने दीजिए।

प्यार गर
है बेपनाह
मुलाकात होने दीजिए।

प्यार का
हमें अपने
एहसास होने दीजिए।

सद्बुद्धि का उपहार

वृक्ष
धरती का हैं
अनुपम उपहार ।
क्यों
हो रहा है
तेरा संहार ?

जिसके लिए
कर रहे तुम
प्राण वायु संचार,
वही
चाहता है करना
तेरा संहार ।

देते
जिसको तुम
जीवन का उपहार,
वही
चाहता है करना
तुझपर प्रहार ।

हे ईष,
करो तुम
सद्बुद्धि का संचार ।
देदो
मानव को
सद्बुद्धि का उपहार ।

नीलम राकेश
लखनऊ

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