साहित्य

नीलम राकेश की कलम से

घर आंगन

ये हमारा
घर आंगन
है नीव जीवन की ।

देखो साक्षी
इसकी चौखट
है हमारे सपनों की।

महकती यहाँ
सुगंध देखो
है हमारे प्यार की ।

फूल बन
यहीं खिली
हैं कलियां सपनों की ।

इसी आंगन
चहकी थी
किलकारी बचपन की ।

हुए पूर्ण
बन माता पिता
हम इन कलियों की ।

मेरी प्यारी बिटिया

कल कल
बहती नदिया सी,
झर झर
झरती झरने सी,
छल छल
छलकती गगरिया सी,
वह है
मेरी प्यारी बिटिया।

बसंत की
बासंती बयार सी,
सावन की
मधुर फुहार सी,
फूलों की
भीनी सुगंध सी,
वह है
मेरी प्यारी बिटिया।

खुशियों के
खुले द्वार सी,
प्यार के
मिले प्रसाद सी,
ईश्वर के
दिये आशीर्वाद सी,
वह है
मेरी प्यारी बिटिया।


नीलम राकेश
लखनऊ

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