साहित्य

पगदण्डी-!

शरद कुमार पाठक

अतीत बनके रहगयी हैं
आज ये पगदण्डियाँ
कर रहा हूं आज स्मृति
कुछ हृदय में आह भरकर
ना दिखते बचपन के खेल
ना यहां पर शोरगुल
ना छकड़ो की उड़ती रजधूल
ना यहां कोई गुननाहट
ना मवेशियों की आहट
संध्या तो है
पर संध्या सी ना लगती
ना तो लौट रहा कोइ घर को
बस सन्नाटा लगता है हमको
निरवरता बनके रहगयी हैं
आज ये पगदण्डियाँ
कर रहा हूंँ आज स्मृति
कुछ हृदय में आह भरकर
अतीत बनके रहगयी हैं
आज ये पगदण्डियाँ

(शरद कुमार पाठक)

डिस्टिक ( हरदोई)

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