साहित्य

परी

आराधना प्रियदर्शनी

उसकी ऑंखें है हिरनी सी,
कोयल जैसी उसकी वाणी,
उसकी हर प्रतिक्रिया मनोरम,
अपनी वह जानी पहचानी।

उसकी काया संगमरमर सी,
जुल्फ़ घने हैं बादल से,
वह मदमस्त बनाती है सबको,
रंग-बिरंगे आँचल से।

सोती कमलों की पंखुड़ियों में,
उठती है रमणीय गुलाब में,
मिलन तो ऐसे मुमकिन नहीं पर,
मिलती है नित ख्वाब में।

उसकी हंसी है बिजली सी,
अलग उसकी है जादूगरी,
फूल कहूं, बहार कहूं, 
अप्सरा कहूं या कहूं परी।

उसका अपूर्व सौंदर्य है,
नहीं है वह ईश्वर से दूर,
परी ही कहते होंगे उसको,
या शायद जन्नत की हूर।

आराधना प्रियदर्शनी
स्वरचित एवं मौलिक 
हजारीबाग
झारखंड

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